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Thursday, 9 August 2018

भीष्म सहानी जन्म दिवस : अमृतसर आ गया

                       भीष्म सहानी जन्म दिवस
 
   
      कल भीष्म साहनी का जन्म दिवस था। उनकी कहानियों के बारे में सोच रहा था कि उनकी कहानियों नाटकीयता के रंग को एक अलग फ्लेवर में लेकर चलती है और वे है - संवादों की ज़िंदादिली । कहानी-सृजन में यह जिंदादिली बहुत प्रभावित करती हैं। संवाद का ऐसा ताना-बाना बहुत कम कहानीकारों के पास है। भीष्म साहनी संवादों की गोटियों को कहानी की पृष्ठभूमि में इस तरह उड़ेलते हैं कि कहानी में सजीवता के राग आ जाते है। सजीवता के कायाकल्प में बुनी इनकी कहानियाँ दर्शकों से मुठभेड़ करती नज़र आती है। मुठभेड़ का यह तरीका ही उनकी कहानियों को ऊँचाई देता है। किन्तु आजकल यह मुठभेड़ कहानियों में सिरे से ग़ायब है। यदि किसी युवा कथाकार मे यह सिफ्त है तो उसका.प्रयोग नहीं कर पाए है। उनके प्रयोग में  फीकापन मालूम होता है। दरअसल हम कह सकते है कि यही फीकापन आज की कहानी की भाषा है । फीकापन ही कहानी की आत्मा है जो एकात्म से सामूहिकता की ओर सफर कर रही है । लेकिन सवाल फिर भी है कि हिन्दी कहानियों के दर्शकों की वो.लंबी जमात कहाँ चली गई जो मुरीद हुआ करती थी.. ?
           
.                      ....     .........      ......    अहमद फहीम

                           अमृतसर आ गया
                             ( भीष्म सहानी )

        गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हँसते और गोरे फौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मजाक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दाईं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह-सिर ढाँपे बैठा थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। संभव है दो-एक और मुसाफिर भी रहे हों, पर वे स्पष्टत: मुझे याद नहीं।

गाड़ी धीमी रफ्तार से चली जा रही थी, और गाड़ी में बैठे मुसाफिर बतिया रहे थे और बाहर गेहूँ के खेतों में हल्की-हल्की लहरियाँ उठ रही थीं, और मैं मन-ही-मन बड़ा खुश था क्योंकि मैं दिल्ली में होनेवाला स्वतंत्रता-दिवस समारोह देखने जा रहा था।

उन दिनों के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है, हम किसी झुटपुटे में जी रहे हैं। शायद समय बीत जाने पर अतीत का सारा व्यापार ही झुटपुटे में बीता जान पड़ता है। ज्यों-ज्यों भविष्य के पट खुलते जाते हैं, यह झुटपुटा और भी गहराता चला जाता है।

उन्हीं दिनों पाकिस्तान के बनाए जाने का ऐलान किया गया था और लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे थे कि भविष्य में जीवन की रूपरेखा कैसी होगी। पर किसी की भी कल्पना बहुत दूर तक नहीं जा पाती थी। मेरे सामने बैठे सरदार जी बार-बार मुझसे पूछ रहे थे कि पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहिब बंबई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जा कर बस जाएँगे, और मेरा हर बार यही जवाब होता - बंबई क्यों छोड़ेंगे, पाकिस्तान में आते-जाते रहेंगे, बंबई छोड़ देने में क्या तुक है! लाहौर और गुरदासपुर के बारे में भी अनुमान लगाए जा रहे थे कि कौन-सा शहर किस ओर जाएगा। मिल बैठने के ढंग में, गप-शप में, हँसी-मजाक में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। कुछ लोग अपने घर छोड़ कर जा रहे थे, जबकि अन्य लोग उनका मजाक उड़ा रहे थे। कोई नहीं जानता था कि कौन-सा कदम ठीक होगा और कौन-सा गलत। एक ओर पाकिस्तान बन जाने का जोश था तो दूसरी ओर हिंदुस्तान के आजाद हो जाने का जोश। जगह-जगह दंगे भी हो रहे थे, और योम-ए-आजादी की तैयारियाँ भी चल रही थीं। इस पूष्ठभूमि में लगता, देश आजाद हो जाने पर दंगे अपने-आप बंद हो जाएँगे। वातावरण में इस झुटपुट में आजादी की सुनहरी धूल-सी उड़ रही थी और साथ-ही-साथ अनिश्चय भी डोल रहा था, और इसी अनिश्चय की स्थिति में किसी-किसी वक्त भावी रिश्तों की रूपरेखा झलक दे जाती थी।

शायद जेहलम का स्टेशन पीछे छूट चुका था जब ऊपर वाली बर्थ पर बैठे पठान ने एक पोटली खोल ली और उसमें से उबला हुआ मांस और नान-रोटी के टुकड़े निकाल-निकाल कर अपने साथियों को देने लगा। फिर वह हँसी-मजाक के बीच मेरी बगल में बैठे बाबू की ओर भी नान का टुकड़ा और मांस की बोटी बढ़ा कर खाने का आग्रह करने लगा था - 'का ले, बाबू, ताकत आएगी। अम जैसा ओ जाएगा। बीवी बी तेरे सात कुश रएगी। काले दालकोर, तू दाल काता ए, इसलिए दुबला ए...'

डिब्बे में लोग हँसने लगे थे। बाबू ने पश्तो में कुछ जवाब दिया और फिर मुस्कराता सिर हिलाता रहा।

इस पर दूसरे पठान ने हँस कर कहा - 'ओ जालिम, अमारे हाथ से नई लेता ए तो अपने हाथ से उठा ले। खुदा कसम बकरे का गोश्त ए, और किसी चीज का नईए।'

ऊपर बैठा पठान चहक कर बोला - 'ओ खंजीर के तुम, इदर तुमें कौन देखता ए? अम तेरी बीवी को नई बोलेगा। ओ तू अमारे साथ बोटी तोड़। अम तेरे साथ दाल पिएगा...'

इस पर कहकहा उठा, पर दुबला-पतला बाबू हँसता, सिर हिलाता रहा और कभी-कभी दो शब्द पश्तो में भी कह देता।

'ओ कितना बुरा बात ए, अम खाता ए, और तू अमारा मुँ देखता ए...' सभी पठान मगन थे।

'यह इसलिए नहीं लेता कि तुमने हाथ नहीं धोए हैं,' स्थूलकाय सरदार जी बोले और बोलते ही खी-खी करने लगे! अधलेटी मुद्रा में बैठे सरदार जी की आधी तोंद सीट के नीचे लटक रही थी - 'तुम अभी सो कर उठे हो और उठते ही पोटली खोल कर खाने लग गए हो, इसीलिए बाबू जी तुम्हारे हाथ से नहीं लेते, और कोई बात नहीं।' और सरदार जी ने मेरी ओर देख कर आँख मारी और फिर खी-खी करने लगे।

'मांस नई खाता ए, बाबू तो जाओ जनाना डब्बे में बैटो, इदर क्या करता ए?' फिर कहकहा उठा।

डब्बे में और भी अनेक मुसाफिर थे लेकिन पुराने मुसाफिर यही थे जो सफर शुरू होने में गाड़ी में बैठे थे। बाकी मुसाफिर उतरते-चढ़ते रहे थे। पुराने मुसाफिर होने के नाते उनमें एक तरह की बेतकल्लुफी आ गई थी।

'ओ इदर आ कर बैठो। तुम अमारे साथ बैटो। आओ जालिम, किस्सा-खानी की बातें करेंगे।'

तभी किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी और नए मुसाफिरों का रेला अंदर आ गया था। बहुत-से मुसाफिर एक साथ अंदर घुसते चले आए थे।

'कौन-सा स्टेशन है?' किसी ने पूछा।

'वजीराबाद है शायद,' मैंने बाहर की ओर देख कर कहा।

गाड़ी वहाँ थोड़ी देर के लिए खड़ी रही। पर छूटने से पहले एक छोटी-सी घटना घटी। एक आदमी साथ वाले डिब्बे में से पानी लेने उतरा और नल पर जा कर पानी लोटे में भर रहा था तभी वह भाग कर अपने डिब्बे की ओर लौट आया। छलछलाते लोटे में से पानी गिर रहा था। लेकिन जिस ढंग से वह भागा था, उसी ने बहुत कुछ बता दिया था। नल पर खड़े और लोग भी, तीन-चार आदमी रहे होंगे - इधर-उधर अपने-अपने डिब्बे की ओर भाग गए थे। इस तरह घबरा कर भागते लोगों को मैं देख चुका था। देखते-ही-देखते प्लेटफार्म खाली हो गया। मगर डिब्बे के अंदर अभी भी हँसी-मजाक चल रहा था।

'कहीं कोई गड़बड़ है,' मेरे पास बैठे दुबले बाबू ने कहा।

कहीं कुछ था, लेकिन क्या था, कोई भी स्पष्ट नहीं जानता था। मैं अनेक दंगे देख चुका था इसलिए वातावरण में होने वाली छोटी-सी तबदील को भी भाँप गया था। भागते व्यक्ति, खटाक से बंद होते दरवाजे, घरों की छतों पर खड़े लोग, चुप्पी और सन्नाटा, सभी दंगों के चिह्न थे।

तभी पिछले दरवाजे की ओर से, जो प्लेटफार्म की ओर न खुल कर दूसरी ओर खुलता था, हल्का-सा शोर हुआ। कोई मुसाफिर अंदर घुसना चाह रहा था।

'कहाँ घुसा आ रहा है, नहीं है जगह! बोल दिया जगह नहीं है,' किसी ने कहा।

'बंद करो जी दरवाजा। यों ही मुँह उठाए घुसे आते हैं।' आवाजें आ रही थीं।

जितनी देर कोई मुसाफिर डिब्बे के बाहर खड़ा अंदर आने की चेष्टा करता रहे, अंदर बैठे मुसाफिर उसका विरोध करते रहते हैं। पर एक बार जैसे-तैसे वह अंदर जा जाए तो विरोध खत्म हो जाता है, और वह मुसाफिर जल्दी ही डिब्बे की दुनिया का निवासी बन जाता है, और अगले स्टेशन पर वही सबसे पहले बाहर खड़े मुसाफिरों पर चिल्लाने लगता है - नहीं है जगह, अगले डिब्बे में जाओ... घुसे आते हैं...

दरवाजे पर शोर बढ़ता जा रहा था। तभी मैले-कुचैले कपड़ों और लटकती मूँछों वाला एक आदमी दरवाजे में से अंदर घुसता दिखाई दिया। चीकट, मैले कपड़े, जरूर कहीं हलवाई की दुकान करता होगा। वह लोगों की शिकायतों-आवाजों की ओर ध्यान दिए बिना दरवाजे की ओर घूम कर बड़ा-सा काले रंग का संदूक अंदर की ओर घसीटने लगा।

'आ जाओ, आ जाओ, तुम भी चढ़ जाओ! वह अपने पीछे किसी से कहे जा रहा था। तभी दरवाजे में एक पतली सूखी-सी औरत नजर आई और उससे पीछे सोलह-सतरह बरस की साँवली-सी एक लड़की अंदर आ गई। लोग अभी भी चिल्लाए जा रहे थे। सरदार जी को कूल्हों के बल उठ कर बैठना पड़ा।'

'बंद करो जी दरवाजा, बिना पूछे चढ़े आते हैं, अपने बाप का घर समझ रखा है। मत घुसने दो जी, क्या करते हो, धकेल दो पीछे...' और लोग भी चिल्ला रहे थे।

वह आदमी अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था और उसकी पत्नी और बेटी संडास के दरवाजे के साथ लग कर खड़े थे।

'और कोई डिब्बा नहीं मिला? औरत जात को भी यहाँ उठा लाया है?'

वह आदमी पसीने से तर था और हाँफता हुआ सामान अंदर घसीटे जा रहा था। संदूक के बाद रस्सियों से बँधी खाट की पाटियाँ अंदर खींचने लगा।

'टिकट है जी मेरे पास, मैं बेटिकट नहीं हूँ।' इस पर डिब्बे में बैठे बहुत-से लोग चुप हो गए, पर बर्थ पर बैठा पठान उचक कर बोला - 'निकल जाओ इदर से, देखता नई ए, इदर जगा नई ए।'

और पठान ने आव देखा न ताव, आगे बढ़ कर ऊपर से ही उस मुसाफिर के लात जमा दी, पर लात उस आदमी को लगने के बजाए उसकी पत्नी के कलेजे में लगी और वहीं 'हाय-हाय' करती बैठ गई।

उस आदमी के पास मुसाफिरों के साथ उलझने के लिए वक्त नहीं था। वह बराबर अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था। पर डिब्बे में मौन छा गया। खाट की पाटियों के बाद बड़ी-बड़ी गठरियाँ आईं। इस पर ऊपर बैठे पठान की सहन-क्षमता चुक गई। 'निकालो इसे, कौन ए ये?' वह चिल्लाया। इस पर दूसरे पठान ने, जो नीचे की सीट पर बैठा था, उस आदमी का संदूक दरवाजे में से नीचे धकेल दिया, जहाँ लाल वर्दीवाला एक कुली खड़ा सामान अंदर पहुँचा रहा था।

उसकी पत्नी के चोट लगने पर कुछ मुसाफिर चुप हो गए थे। केवल कोने में बैठो बुढ़िया करलाए जा रही थी - 'ए नेकबख्तो, बैठने दो। आ जा बेटी, तू मेरे पास आ जा। जैसे-तैसे सफर काट लेंगे। छोड़ो बे जालिमो, बैठने दो।'

अभी आधा सामान ही अंदर आ पाया होगा जब सहसा गाड़ी सरकने लगी।

'छूट गया! सामान छूट गया।' वह आदमी बदहवास-सा हो कर चिल्लाया।

'पिताजी, सामान छूट गया।' संडास के दरवाजे के पास खड़ी लड़की सिर से पाँव तक काँप रही थी और चिल्लाए जा रही थी।

'उतरो, नीचे उतरो,' वह आदमी हड़बड़ा कर चिल्लाया और आगे बढ़ कर खाट की पाटियाँ और गठरियाँ बाहर फेंकते हुए दरवाजे का डंडहरा पकड़ कर नीचे उतर गया। उसके पीछे उसकी व्याकुल बेटी और फिर उसकी पत्नी, कलेजे को दोनों हाथों से दबाए हाय-हाय करती नीचे उतर गई।

'बहुत बुरा किया है तुम लोगों ने, बहुत बुरा किया है।' बुढ़िया ऊँचा-ऊँचा बोल रही थी -'तुम्हारे दिल में दर्द मर गया है। छोटी-सी बच्ची उसके साथ थी। बेरहमो, तुमने बहुत बुरा किया है, धक्के दे कर उतार दिया है।'

गाड़ी सूने प्लेटफार्म को लाँघती आगे बढ़ गई। डिब्बे में व्याकुल-सी चुप्पी छा गई। बुढ़िया ने बोलना बंद कर दिया था। पठानों का विरोध कर पाने की हिम्मत नहीं हुई।

तभी मेरी बगल में बैठे दुबले बाबू ने मेरे बाजू पर हाथ रख कर कहा - 'आग है, देखो आग लगी है।'

गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ कर आगे निकल आई थी और शहर पीछे छूट रहा था। तभी शहर की ओर से उठते धुएँ के बादल और उनमें लपलपाती आग के शोले नजर आने लगे।

'दंगा हुआ है। स्टेशन पर भी लोग भाग रहे थे। कहीं दंगा हुआ है।'

शहर में आग लगी थी। बात डिब्बे-भर के मुसाफिरों को पता चल गई और वे लपक-लपक कर खिड़कियों में से आग का दृश्य देखने लगे।

जब गाड़ी शहर छोड़ कर आगे बढ़ गई तो डिब्बे में सन्नाटा छा गया। मैंने घूम कर डिब्बे के अंदर देखा, दुबले बाबू का चेहरा पीला पड़ गया था और माथे पर पसीने की परत किसी मुर्दे के माथे की तरह चमक रही थी। मुझे लगा, जैसे अपनी-अपनी जगह बैठे सभी मुसाफिरों ने अपने आसपास बैठे लोगों का जायजा ले लिया है। सरदार जी उठ कर मेरी सीट पर आ बैठे। नीचे वाली सीट पर बैठा पठान उठा और अपने दो साथी पठानों के साथ ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया। यही क्रिया शायद रेलगाड़ी के अन्य डिब्बों में भी चल रही थी। डिब्बे में तनाव आ गया। लोगों ने बतियाना बंद कर दिया। तीनों-के-तीनों पठान ऊपरवाली बर्थ पर एक साथ बैठे चुपचाप नीचे की ओर देखे जा रहे थे। सभी मुसाफिरों की आँखें पहले से ज्यादा खुली-खुली, ज्यादा शंकित-सी लगीं। यही स्थिति संभवत: गाड़ी के सभी डिब्बों में व्याप्त हो रही थी।

'कौन-सा स्टेशन था यह?' डिब्बे में किसी ने पूछा।

'वजीराबाद,' किसी ने उत्तर दिया।

जवाब मिलने पर डिब्बे में एक और प्रतिक्रिया हुई। पठानों के मन का तनाव फौरन ढीला पड़ गया। जबकि हिंदू-सिक्ख मुसाफिरों की चुप्पी और ज्यादा गहरी हो गई। एक पठान ने अपनी वास्कट की जेब में से नसवार की डिबिया निकाली और नाक में नसवार चढ़ाने लगा। अन्य पठान भी अपनी-अपनी डिबिया निकाल कर नसवार चढ़ाने लगे। बुढ़िया बराबर माला जपे जा रही थी। किसी-किसी वक्त उसके बुदबुदाते होंठ नजर आते, लगता, उनमें से कोई खोखली-सी आवाज निकल रही है।

अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो वहाँ भी सन्नाटा था। कोई परिंदा तक नहीं फड़क रहा था। हाँ, एक भिश्ती, पीठ पर पानी की मशकल लादे, प्लेटफार्म लाँघ कर आया और मुसाफिरों को पानी पिलाने लगा।

'लो, पियो पानी, पियो पानी।' औरतों के डिब्बे में से औरतों और बच्चों के अनेक हाथ बाहर निकल आए थे।

'बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मरे हैं। लगता था, वह इस मार-काट में अकेला पुण्य कमाने चला आया है।'

गाड़ी सरकी तो सहसा खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे। दूर-दूर तक, पहियों की गड़गड़ाहट के साथ, खिड़कियों के पल्ले चढ़ाने की आवाज आने लगी।

किसी अज्ञात आशंकावश दुबला बाबू मेरे पासवाली सीट पर से उठा और दो सीटों के बीच फर्श पर लेट गया। उसका चेहरा अभी भी मुर्दे जैसा पीला हो रहा था। इस पर बर्थ पर बैठा पठान उसकी ठिठोली करने लगा - 'ओ बेंगैरत, तुम मर्द ए कि औरत ए? सीट पर से उट कर नीचे लेटता ए। तुम मर्द के नाम को बदनाम करता ए।' वह बोल रहा था और बार-बार हँसे जा रहा था। फिर वह उससे पश्तो में कुछ कहने लगा। बाबू चुप बना लेटा रहा। अन्य सभी मुसाफिर चुप थे। डिब्बे का वातावरण बोझिल बना हुआ था।

'ऐसे आदमी को अम डिब्बे में नईं बैठने देगा। ओ बाबू, अगले स्टेशन पर उतर जाओ, और जनाना डब्बे में बैटो।'

मगर बाबू की हाजिरजवाबी अपने कंठ में सूख चली थी। हकला कर चुप हो रहा। पर थोड़ी देर बाद वह अपने आप उठ कर सीट पर जा बैठा और देर तक अपने कपड़ों की धूल झाड़ता रहा। वह क्यों उठ कर फर्श पर लेट गया था? शायद उसे डर था कि बाहर से गाड़ी पर पथराव होगा या गोली चलेगी, शायद इसी कारण खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जा रहे थे।

कुछ भी कहना कठिन था। मुमकिन है किसी एक मुसाफिर ने किसी कारण से खिड़की का पल्ला चढ़ाया हो। उसकी देखा-देखी, बिना सोचे-समझे, धड़ाधड़ खिड़कियों के पल्ले चढ़ाए जाने लगे थे।

बोझिल अनिश्चत-से वातावरण में सफर कटने लगा। रात गहराने लगी थी। डिब्बे के मुसाफिर स्तब्ध और शंकित ज्यों-के-त्यों बैठे थे। कभी गाड़ी की रफ्तार सहसा टूट कर धीमी पड़ जाती तो लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगते। कभी रास्ते में ही रुक जाती तो डिब्बे के अंदर का सन्नाटा और भी गहरा हो उठता। केवल पठान निश्चित बैठे थे। हाँ, उन्होंने भी बतियाना छोड़ दिया था, क्योंकि उनकी बातचीत में कोई भी शामिल होने वाला नहीं था।

धीरे-धीरे पठान ऊँघने लगे जबकि अन्य मुसाफिर फटी-फटी आँखों से शून्य में देखे जा रहे थे। बुढ़िया मुँह-सिर लपेटे, टाँगें सीट पर चढ़ाए, बैठा-बैठा सो गई थी। ऊपरवाली बर्थ पर एक पठान ने, अधलेटे ही, कुर्ते की जेब में से काले मनकों की तसबीह निकाल ली और उसे धीरे-धीरे हाथ में चलाने लगा।

खिड़की के बाहर आकाश में चाँद निकल आया और चाँदनी में बाहर की दुनिया और भी अनिश्चित, और भी अधिक रहस्यमयी हो उठी। किसी-किसी वक्त दूर किसी ओर आग के शोले उठते नजर आते, कोई नगर जल रहा था। गाड़ी किसी वक्त चिंघाड़ती हुई आगे बढ़ने लगती, फिर किसी वक्त उसकी रफ्तार धीमी पड़ जाती और मीलों तक धीमी रफ्तार से ही चलती रहती।

सहसा दुबला बाबू खिड़की में से बाहर देख कर ऊँची आवाज में बोला - 'हरबंसपुरा निकल गया है।' उसकी आवाज में उत्तेजना थी, वह जैसे चीख कर बोला था। डिब्बे के सभी लोग उसकी आवाज सुन कर चौंक गए। उसी वक्त डिब्बे के अधिकांश मुसाफिरों ने मानो उसकी आवाज को ही सुन कर करवट बदली।

'ओ बाबू, चिल्लाता क्यों ए?', तसबीह वाला पठान चौंक कर बोला - 'इदर उतरेगा तुम? जंजीर खींचूँ?' अैर खी-खी करके हँस दिया। जाहिर है वह हरबंसपुरा की स्थिति से अथवा उसके नाम से अनभिज्ञ था।

बाबू ने कोई उत्तर नहीं दिया, केवल सिर हिला दिया और एक-आध बार पठान की ओर देख कर फिर खिड़की के बाहर झाँकने लगा।

डब्बे में फिर मौन छा गया। तभी इंजन ने सीटी दी और उसकी एकरस रफ्तार टूट गई। थोड़ी ही देर बाद खटाक-का-सा शब्द भी हुआ। शायद गाड़ी ने लाइन बदली थी। बाबू ने झाँक कर उस दिशा में देखा जिस ओर गाड़ी बढ़ी जा रही थी।

'शहर आ गया है।' वह फिर ऊँची आवाज में चिल्लाया - 'अमृतसर आ गया है।' उसने फिर से कहा और उछल कर खड़ा हो गया, और ऊपर वाली बर्थ पर लेटे पठान को संबोधित करके चिल्लाया - 'ओ बे पठान के बच्चे! नीचे उतर तेरी माँ की... नीचे उतर, तेरी उस पठान बनानेवाले की मैं...'

बाबू चिल्लाने लगा और चीख-चीख कर गालियाँ बकने लगा था। तसबीह वाले पठान ने करवट बदली और बाबू की ओर देख कर बोला -'ओ क्या ए बाबू? अमको कुच बोला?'

बाबू को उत्तेजित देख कर अन्य मुसाफिर भी उठ बैठे।

'नीचे उतर, तेरी मैं... हिंदू औरत को लात मारता है! हरामजादे! तेरी उस...।'

'ओ बाबू, बक-बकर नई करो। ओ खजीर के तुख्म, गाली मत बको, अमने बोल दिया। अम तुम्हारा जबान खींच लेगा।'

'गाली देता है मादर...।' बाबू चिल्लाया और उछल कर सीट पर चढ़ गया। वह सिर से पाँव तक काँप रहा था।

'बस-बस।' सरदार जी बोले - 'यह लड़ने की जगह नहीं है। थोड़ी देर का सफर बाकी है, आराम से बैठो।'

'तेरी मैं लात न तोड़ूँ तो कहना, गाड़ी तेरे बाप की है?' बाबू चिल्लाया।

'ओ अमने क्या बोला! सबी लोग उसको निकालता था, अमने बी निकाला। ये इदर अमको गाली देता ए। अम इसका जबान खींच लेगा।'

बुढ़िया बीच में फिर बोले उठी - 'वे जीण जोगयो, अराम नाल बैठो। वे रब्ब दिए बंदयो, कुछ होश करो।'

उसके होंठ किसी प्रेत की तरह फड़फड़ाए जा रहे थे और उनमें से क्षीण-सी फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी।

बाबू चिल्लाए जा रहा था - 'अपने घर में शेर बनता था। अब बोल, तेरी मैं उस पठान बनानेवाले की...।'

तभी गाड़ी अमृतसर के प्लेटफार्म पर रुकी। प्लेटफार्म लोगों से खचाखच भरा था। प्लेटफार्म पर खड़े लोग झाँक-झाँक कर डिब्बों के अंदर देखने लगे। बार-बार लोग एक ही सवाल पूछ रहे थे - 'पीछे क्या हुआ है? कहाँ पर दंगा हुआ है?'

खचाखच भरे प्लेटफार्म पर शायद इसी बात की चर्चा चल रही थी कि पीछे क्या हुआ है। प्लेटफार्म पर खड़े दो-तीन खोमचे वालों पर मुसाफिर टूटे पड़ रहे थे। सभी को सहसा भूख और प्यास परेशान करने लगी थी। इसी दौरान तीन-चार पठान हमारे डिब्बे के बाहर प्रकट हो गए और खिड़की में से झाँक-झाँक कर अंदर देखने लगे। अपने पठान साथियों पर नजर पड़ते ही वे उनसे पश्तो में कुछ बोलने लगे। मैंने घूम कर देखा, बाबू डिब्बे में नहीं था। न जाने कब वह डिब्बे में से निकल गया था। मेरा माथा ठिनका। गुस्से में वह पागल हुआ जा रहा था। न जाने क्या कर बैठे! पर इस बीच डिब्बे के तीनों पठान, अपनी-अपनी गठरी उठा कर बाहर निकल गए और अपने पठान साथियों के साथ गाड़ी के अगले डिब्बे की ओर बढ़ गए। जो विभाजन पहले प्रत्येक डिब्बे के भीतर होता रहा था, अब सारी गाड़ी के स्तर पर होने लगा था।

खोमचेवालों के इर्द-गिर्द भीड़ छँटने लगी। लोग अपने-अपने डिब्बों में लौटने लगे। तभी सहसा एक ओर से मुझे वह बाबू आता दिखाई दिया। उसका चेहरा अभी भी बहुत पीला था और माथे पर बालों की लट झूल रही थी। नजदीक पहुँचा, तो मैंने देखा, उसने अपने दाएँ हाथ में लोहे की एक छड़ उठा रखी थी। जाने वह उसे कहाँ मिल गई थी! डिब्बे में घुसते समय उसने छड़ को अपनी पीठ के पीछे कर लिया और मेरे साथ वाली सीट पर बैठने से पहले उसने हौले से छड़ को सीट के नीचे सरका दिया। सीट पर बैठते ही उसकी आँखें पठान को देख पाने के लिए ऊपर को उठीं। पर डिब्बे में पठानों को न पा कर वह हड़बड़ा कर चारों ओर देखने लगा।

'निकल गए हरामी, मादर... सब-के-सब निकल गए!' फिर वह सिटपिटा कर उठ खड़ा हुआ चिल्ला कर बोला - 'तुमने उन्हें जाने क्यों दिया? तुम सब नामर्द हो, बुजदिल!'

पर गाड़ी में भीड़ बहुत थी। बहुत-से नए मुसाफिर आ गए थे। किसी ने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।

गाड़ी सरकने लगी तो वह फिर मेरी वाली सीट पर आ बैठा, पर वह बड़ा उत्तेजित था और बराबर बड़बड़ाए जा रहा था।

धीरे-धीरे हिचकोले खाती गाड़ी आगे बढ़ने लगी। डिब्बे में पुराने मुसाफिरों ने भरपेट पूरियाँ खा ली थीं और पानी पी लिया था और गाड़ी उस इलाके में आगे बढ़ने लगी थी, जहाँ उनके जान-माल को खतरा नहीं था।

नए मुसाफिर बतिया रहे थे। धीरे-धीरे गाड़ी फिर समतल गति से चलने लगी थी। कुछ ही देर बाद लोग ऊँघने भी लगे थे। मगर बाबू अभी भी फटी-फटी आँखों से सामने की ओर देखे जा रहा था। बार-बार मुझसे पूछता कि पठान डिब्बे में से निकल कर किस ओर को गए हैं। उसके सिर पर जुनून सवार था।

गाड़ी के हिचकोलों में मैं खुद ऊँघने लगा था। डिब्बे में लेट पाने के लिए जगह नहीं थी। बैठे-बैठे ही नींद में मेरा सिर कभी एक ओर को लुढ़क जाता, कभी दूसरी ओर को। किसी-किसी वक्त झटके से मेरी नींद टूटती, और मुझे सामने की सीट पर अस्त-व्यस्त से पड़े सरदार जी के खर्राटे सुनाई देते। अमृतसर पहुँचने के बाद सरदार जी फिर से सामनेवाली सीट पर टाँगे पसार कर लेट गए थे। डिब्बे में तरह-तरह की आड़ी-तिरछी मुद्राओं में मुसाफिर पड़े थे। उनकी बीभत्स मुद्राओं को देख कर लगता, डिब्बा लाशों से भरा है। पास बैठे बाबू पर नजर पड़ती तो कभी तो वह खिड़की के बाहर मुँह किए देख रहा होता, कभी दीवार से पीठ लगाए तन कर बैठा नजर आता।

किसी-किसी वक्त गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकती तो पहियों की गड़गड़ाहट बंद होने पर निस्तब्धता-सी छा जाती। तभी लगता, जैसे प्लेटफार्म पर कुछ गिरा है, या जैसे कोई मुसाफिर गाड़ी में से उतरा है और मैं झटके से उठ कर बैठ जाता।

इसी तरह जब एक बार मेरी नींद टूटी तो गाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ गई थी, और डिब्बे में अँधेरा था। मैंने उसी तरह अधलेटे खिड़की में से बाहर देखा। दूर, पीछे की ओर किसी स्टेशन के सिगनल के लाल कुमकुमे चमक रहे थे। स्पष्टत: गाड़ी कोई स्टेशन लाँघ कर आई थी। पर अभी तक उसने रफ्तार नहीं पकड़ी थी।

डिब्बे के बाहर मुझे धीमे-से अस्फुट स्वर सुनाई दिए। दूर ही एक धूमिल-सा काला पुंज नजर आया। नींद की खुमारी में मेरी आँखें कुछ देर तक उस पर लगी रहीं, फिर मैंने उसे समझ पाने का विचार छोड़ दिया। डिब्बे के अंदर अँधेरा था, बत्तियाँ बुझी हुई थीं, लेकिन बाहर लगता था, पौ फटने वाली है।

मेरी पीठ-पीछे, डिब्बे के बाहर किसी चीज को खरोंचने की-सी आवाज आई। मैंने दरवाजे की ओर घूम कर देखा। डिब्बे का दरवाजा बंद था। मुझे फिर से दरवाजा खरोंचने की आवाज सुनाई दी। फिर, मैंने साफ-साफ सुना, लाठी से कोई डिब्बे का दरवाजा पटपटा रहा था। मैंने झाँक कर खिड़की के बाहर देखा। सचमुच एक आदमी डिब्बे की दो सीढ़ियाँ चढ़ आया था। उसके कंधे पर एक गठरी झूल रही थी, और हाथ में लाठी थी और उसने बदरंग-से कपड़े पहन रखे थे और उसके दाढ़ी भी थी। फिर मेरी नजर बाहर नीचे की ओर आ गई। गाड़ी के साथ-साथ एक औरत भागती चली आ रही थी, नंगे पाँव, और उसने दो गठरियाँ उठा रखी थीं। बोझ के कारण उससे दौड़ा नहीं जा रहा था। डिब्बे के पायदान पर खड़ा आदमी बार-बार उसकी ओर मुड़ कर देख रहा था और हाँफता हुआ कहे जा रहा था - 'आ जा, आ जा, तू भी चढ़ आ, आ जा!'

दरवाजे पर फिर से लाठी पटपटाने की आवाज आई - 'खोलो जी दरवाजा, खुदा के वास्ते दरवाजा खोलो।'

वह आदमी हाँफ रहा था - 'खुदा के लिए दरवाजा खोलो। मेरे साथ में औरतजात है। गाड़ी निकल जाएगी...'

सहसा मैंने देखा, बाबू हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और दरवाजे के पास जा कर दरवाजे में लगी खिड़की में से मुँह बाहर निकाल कर बोला - 'कौन है? इधर जगह नहीं है।'

बाहर खड़ा आदमी फिर गिड़गिड़ाने लगा - 'खुदा के वास्ते दरवाजा खोलो। गाड़ी निकल जाएगी...'

और वह आदमी खिड़की में से अपना हाथ अंदर डाल कर दरवाजा खोल पाने के लिए सिटकनी टटोलने लगा।

'नहीं है जगह, बोल दिया, उतर जाओ गाड़ी पर से।' बाबू चिल्लाया और उसी क्षण लपक कर दरवाजा खोल दिया।

'या अल्लाह! उस आदमी के अस्फुट-से शब्द सुनाई दिए। दरवाजा खुलने पर जैसे उसने इत्मीनान की साँस ली हो।'

और उसी वक्त मैंने बाबू के हाथ में छड़ चमकते देखा। एक ही भरपूर वार बाबू ने उस मुसाफिर के सिर पर किया था। मैं देखते ही डर गया और मेरी टाँगें लरज गईं। मुझे लगा, जैसे छड़ के वार का उस आदमी पर कोई असर नहीं हुआ। उसके दोनों हाथ अभी भी जोर से डंडहरे को पकड़े हुए थे। कंधे पर से लटकती गठरी खिसट कर उसकी कोहनी पर आ गई थी।

तभी सहसा उसके चेहरे पर लहू की दो-तीन धारें एक साथ फूट पड़ीं। मुझे उसके खुले होंठ और चमकते दाँत नजर
वह दो-एक बार 'या अल्लाह!' बुदबुदाया, फिर उसके पैर लड़खड़ा गए। उसकी आँखों ने बाबू की ओर देखा, अधमुँदी-सी आँखें, जो धीर-धीरे सिकुड़ती जा रही थीं, मानो उसे पहचानने की कोशिश कर रही हों कि वह कौन है और उससे किस अदावत का बदला ले रहा है। इस बीच अँधेरा कुछ और छन गया था। उसके होंठ फिर से फड़फड़ाए और उनमें सफेद दाँत फिर से झलक उठे। मुझे लगा, जैसे वह मुस्कराया है, पर वास्तव में केवल क्षय के ही कारण होंठों में बल पड़ने लगे थे।

नीचे पटरी के साथ-साथ भागती औरत बड़बड़ाए और कोसे जा रही थी। उसे अभी भी मालूम नहीं हो पाया था कि क्या हुआ है। वह अभी भी शायद यह समझ रही थी कि गठरी के कारण उसका पति गाड़ी पर ठीक तरह से चढ़ नहीं पा रहा है, कि उसका पैर जम नहीं पा रहा है। वह गाड़ी के साथ-साथ भागती हुई, अपनी दो गठरियों के बावजूद अपने पति के पैर पकड़-पकड़ कर सीढ़ी पर टिकाने की कोशिश कर रही थी।

तभी सहसा डंडहरे से उस आदमी के दोनों हाथ छूट गए और वह कटे पेड़ की भाँति नीचे जा गिरा। और उसके गिरते ही औरत ने भागना बंद कर दिया, मानो दोनों का सफर एक साथ ही खत्म हो गया हो।

बाबू अभी भी मेरे निकट, डिब्बे के खुले दरवाजे में बुत-का-बुत बना खड़ा था, लोहे की छड़ अभी भी उसके हाथ में थी। मुझे लगा, जैसे वह छड़ को फेंक देना चाहता है लेकिन उसे फेंक नहीं पा रहा, उसका हाथ जैसे उठ नहीं रहा था। मेरी साँस अभी भी फूली हुई थी और डिब्बे के अँधियारे कोने में मैं खिड़की के साथ सट कर बैठा उसकी ओर देखे जा रहा था।

फिर वह आदमी खड़े-खड़े हिला। किसी अज्ञात प्रेरणावश वह एक कदम आगे बढ़ आया और दरवाजे में से बाहर पीछे की ओर देखने लगा। गाड़ी आगे निकलती जा रही थी। दूर, पटरी के किनारे अँधियारा पुंज-सा नजर आ रहा था।

बाबू का शरीर हरकत में आया। एक झटके में उसने छड़ को डिब्बे के बाहर फेंक दिया। फिर घूम कर डिब्बे के अंदर दाएँ-बाएँ देखने लगा। सभी मुसाफिर सोए पड़े थे। मेरी ओर उसकी नजर नहीं उठी।

थोड़ी देर तक वह खड़ा डोलता रहा, फिर उसने घूम कर दरवाजा बंद कर दिया। उसने ध्यान से अपने कपड़ों की ओर देखा, अपने दोनों हाथों की ओर देखा, फिर एक-एक करके अपने दोनों हाथों को नाक के पास ले जा कर उन्हें सूँघा, मानो जानना चाहता हो कि उसके हाथों से खून की बू तो नहीं आ रही है। फिर वह दबे पाँव चलता हुआ आया और मेरी बगलवाली सीट पर बैठ गया।

धीरे-धीरे झुटपुटा छँटने लगा, दिन खुलने लगा। साफ-सुथरी-सी रोशनी चारों ओर फैलने लगी। किसी ने जंजीर खींच कर गाड़ी को खड़ा नहीं किया था, छड़ खा कर गिरी उसकी देह मीलों पीछे छूट चुकी थी। सामने गेहूँ के खेतों में फिर से हल्की-हल्की लहरियाँ उठने लगी थीं।

सरदार जी बदन खुजलाते उठ बैठे। मेरी बगल में बैठा बाबू दोनों हाथ सिर के पीछे रखे सामने की ओर देखे जा रहा था। रात-भर में उसके चेहरे पर दाढ़ी के छोटे-छोटे बाल उग आए थे। अपने सामने बैठा देख कर सरदार उसके साथ बतियाने लगा - 'बड़े जीवट वाले हो बाबू, दुबले-पतले हो, पर बड़े गुर्दे वाले हो। बड़ी हिम्मत दिखाई है। तुमसे डर कर ही वे पठान डिब्बे में से निकल गए। यहाँ बने रहते तो एक-न-एक की खोपड़ी तुम जरूर दुरुस्त कर देते...' और सरदार जी हँसने लगे।

बाबू जवाब में मुसकराया - एक वीभत्स-सी मुस्कान, और देर तक सरदार जी के चेहरे की ओर देखता रहा।

Wednesday, 25 July 2018

बीसवीं सदी के डूबते कथाकारों की श्रंखला-1 में - तमाशे में डूबा हुआ देश : असगर वजाहत

     

    बीसवीं सदी के डूबते कथाकारों की श्रंखला-1

       तो आइये अब बीसवीं सदी के डूबते कथाकारों की श्रंखला-1 में पढ़ते हैं हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ " श्री असगर वजाहत " की कहानी --
' तमाशे में डूबा हुआ देश '
लेकिन-किन्तु-परन्तु उससे पहले कहानी के लिए मेरी ओर से दो पंक्ति -
" हर क्षण पिला हुआ है जो देश ' सफेद ' होने में

  एक आह बता रही है देश का चरित्र लालम-लाल है "

       और वर्तमान कहानी-लेखन पर छोटी सिरफिरी।

          नाटकीयता, कहानियों में नमक की तरह होनी चाहिए ।  बे-नमक कहानियां सपाट सड़क हो जाती है। पढ़ो और मौक्ष पा लो। पढ़ो और गंतव्य तक यूँही पँहुच जाओ । यूँही पँहुचना कहानी का सौन्दर्य नहीं होता है। कहानी जबतक आपके मन-मस्तिष्क के साथ उठा-पटक नहीं करे या आपके कैनवस पर रंग न छिड़के तबतक कोई रास नहीं। इसलिए कहानियों में चीनी, मिसरी, शहद आदि-आदि चाहे जितना हो, फर्क नहीं पढ़ता। मगर कहानियों में नमक का न होना। उन्हें बे-स्वादी का पजामा पहना देता है और नमक जिसे मैनें नाटकीयता कहा है, उन्हें उष्मा देता है।
      वर्तमान दौर की कहानियां इसी अभाव से पीड़ित है। कथाकारों ने इसी तत्व को छोड़कर शेष सब सोख लिया है। शायद इसीलिए पिछले ही वर्ष उदय प्रकाश ने कैफी हाशमी की कहानी ' टमाटर होता है फल ' पढ़ने के बाद अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था " मैंने आज कैफी हाशमी की कहानी - टमाटर होता है फल - पढ़ी। बहुत अरसे बाद कहानी से हिंदी में ऐसी मुलाक़ात हुई । अब हिन्दी पढ़ता रहूँगा। " इस वाक्य से वर्तमान दौर की कहानियों की श्रम-साध्यता खुल जाती है कि भीड़ की तरह जमा होती अधिकतर रचनाओं  का किस्सागोई के यर्थाथ और नाटकीयता से कोई वास्ता नहीं रहा।  रचनाओ में किस्से खूब होने लगे है। किस्सागोई की " गोई " हज़म कर बैठे कथाकार गोष्ठियों में चाव से कहानियों को दूहते है और निकले दूध की मिठाईयां खिला-खिलाकर पुरस्कारों की सूची में बाप-दादा हो जाते हैं।
      संज्ञाओ वाले इस दौर में कहानी को संज्ञा बनाते कथाकारों से विनती है कि दिल-फेक प्रेमी की तरह ना लिखे जो हर क्षण प्रेमिकाओ की दुनिया में प्रेम-चालीसा भले ही फांकता रहता हो किन्तु ऐसी दुनिया में उसे प्रेम का कलेवा नहीं मिलता है। प्रेम-पीड़ा का नमकीनी यर्थाथ जिह्वा पर रमता नहीं। वे आभासी छाया मात्र बनकर रह जाती रह जाती पीड़ा का रस छानते रहता है। आज का कथाकार भी कहानी-प्रेम का आभासी रस छान रहे है। कथाकार की आभासी छाया कहानी पर मंडराती रहती है। कथाकार ही तय कर देते है कि कहानी यही होनी चाहिए। इसलिए कथाकार को चाहिए कि वे मंडरा रहे आभासी छाया को पहचाने और लिखे वही जो प्रासंगिक हो अमुक के लिए । सम्मुख हेतू लिखना इस दौर का मुहावरा नहीं हो सकता हैं।
                                               - अहमद फहीम



                             तमाशे में डूबा हुआ देश 


                     

          
     

                                       असगर वजाहत 


           मैं पहले कहानियाँ लिखा करता था। अब मैंने कहानियाँ लिखना छोड़ दिया है क्योंकि कहानी लिखने से कोई बात नहीं बनती। झूठे सच्चे पात्र गढ़ना, इधर उधर की घटनाओं को समेटना, चटपटे संवाद लिखना, अपनी पढ़ी हुई किताबों की जानकारियों और अपने ज्ञान को कहानी में उलट देने से क्या होता है? मैं अपने दूसरे कहानीकार मित्रों को सलाह देता हूँ कि वे कहानी वहानी लिखने का काम छोड़ दें। हमारे इस देश में जहाँ रोज, हर पल, हर जगह कहानी से ज्यादा निर्मम घट रहा हो वहाँ कहानी लिखना बेकार की बात है। अपने चारों तरफ निगाह उठा कर देखिए, आपको बिखरी पड़ी कहानियाँ देख कर अपने कहानीकार होने पर शर्म आएगी जो मुझे आ चुकी है और मैंने कहानियाँ लिखना बंद कर दिया है। लेकिन चूँकि लिखने की आदत पड़ चुकी है और लिखे बिना चैन भी नहीं आता इसलिए सोचा है मैं कहानियाँ न लिख कर 'वाक्या' लिखा करूँगा। 'वाक्या' उर्दू का शब्द है जिसका मतलब 'घटना' निकाला जा सकता है लेकिन शायद बात पूरी बनेगी नहीं। 'वाक्या' किसी ऐसी सच्ची घटना का विवरण कहा जा सकता है जो रोचक, नाटकीय और मनोरंजक हो। केवल घटना मात्र न हो। अगर मैं आपको सिर्फ घटनाएँ सुनाने लगूँगा तो उसमें कुछ मजा न आएगा और आप मुझे बेवकूफ और मूर्ख समझ कर पढ़ना बंद कर देंगे। हो सकता है यह काम आप 'वाक्या' सुनने के बाद भी करें लेकिन मुझे अब भी उम्मीद है कि और कुछ करें या न करें 'वाक्ये' को सुन लेंगे। यह सच्चा वाक्या है। बहरहाल सच्चाई तो वैसे भी सामने आ जाएगी। मेरे कहने से न सच झूठ हो सकता है और न झूठ सच हो जाएगा।
हमारे ही देश के एक शहर में एक आदमी गायब हो गया और दो कुत्ते के पिल्ले गायब हो गए। मैं शहर का नाम नहीं बताऊँगा क्योंकि वाक्यानिगार होने का यह मतलब नहीं है कि मैं लोगों का दिल दुखाऊँ और अपना जीना हराम कर लूँ। आप जानते ही हैं कि आज हमारे अहिंसक देश में हर तरह की हिंसा तरक्की पर है। पहले जो बात तू तू मैं मैं पर खत्म हो जाती वह अब हत्या का कारण बन जाती है। अब तो हत्यारों का सम्मान होता है। मैं जिस इलाके का रहनेवाला हूँ वहाँ जिसने जितनी हत्याएँ की होती हैं उसका उतना सम्मान होता है। यही कारण है कि आज तक मेरे इलाके में मेरा सम्मान नहीं हो सका है क्योंकि मैं मक्खी मारने लायक भी नहीं हूँ। सम्मान के मानदंड बदल गए हैं। इसे साबित करने के लिए मिसाल के लिए एक और वाक्या भी है। विधान सभा के चुनाव हो जाने के बाद कुछ नेतागण विधायक कैंटीन में बैठे बातचीत कर रहे थे और सब एक दूसरे से पूछ रहे थे कि आपने कहाँ से 'कंटेस्ट' किया था। ध्यान दें कि उनमें लोकतंत्र की भावना कितनी प्रबल थी। वे हारने या जीतने की बात नहीं कर रहे थे, केवल 'कंटेस्ट' करने की बात कर रहे थे। सबने बताया कि उन्होंने कहाँ कहाँ से 'कंटेस्ट' किया है। एक आदमी से पूछा गया तो उसने कहा कि मैंने कहीं से 'कंटेस्ट' नहीं किया है। सब उसे देख कर हैरत में पड़ गए और कहा, जाइए जा कर काउंटर से छह चाय ले आइए।
अब बात लोकतंत्र की शुरू हो गई है तो एक वाक्या और सुनते चलिए। विधान सभा के सामने किसी मुद्दे पर अनिश्चितकालीन अनशन जारी था। किसी सामाजिक सरोकार के मुद्दे पर किसी संस्था की ओर से प्रतिदिन एक आदमी अनशन पर बैठता था। मैं उधर से गुजर रहा था। मैंने देखा कि अनशन पर बैठा आदमी तो पम्मी शर्मा है। मैं उसे जानता हूँ। वह उभरता हुआ नेता है और उसने अपने लिए सभी पार्टियों के दरवाजे खुले रखे हैं। मैंने सोचा क्यों न पम्मी शर्मा से मिल लूँ, ऐसी कठिन घड़ी में मेरे दो शब्द उसे ताकत देंगे और फिर पम्मी से कोई काम पड़ा तो उसे याद रहेगा कि मैंने कठिन क्षणों में उससे कुछ अच्छे शब्द कहे थे। गरज यह कि मैं उसके पास गया। वह मुझे देख कर इतना खुश हो गया जितना पहले न होता था। उसने बताया कि अनशन चालीस दिन से चल रहा है, मुझे अपने देश के विकसित लोकतंत्र पर गर्व हुआ। मैंने उसकी तारीफ की। उसने कहा - 'यार, एक दिन के लिए तुम भी अनशन पर बैठ जाओ।'
मैं पहले तो चौंका, कुछ घबराया पर उसने कहा - 'यार एक दिन की तो बात है, सुबह बैठोगे... शाम को खत्म हो जाएगा।'
मैं तैयार हो गया। सोचा ठीक है यार देश की लोकतंत्रिक ताकतों को मजबूत करने के लिए इतना तो करना चाहिए।
मैं अगले दिन सुबह ही सुबह वहाँ पहुँच गया। वहाँ सात आठ लोग चाय पी रहे थे। पम्मी शर्मा भी था। उसने मुझे गद्दी पर बैठाया। गले में गेंदे के फूलों की माला डाली। तिलक लगाया। मेरा अनशन जारी हो गया। मैं अपनी आत्मा को उत्फुल्ल महसूस करने लगा। थोड़ी देर में पम्मी मेरे पास आया और बोला - 'किसी आदमी का इंतिजाम कर लेना।'
मैं हैरत से उसकी तरफ देखने लगा। वह समझ गया था कि मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूँ।
वह बोला - 'जो अनशन से हटेगा... उसे टेंटवाले का, चायवाले का, जूसवाले का, माली का 'पेमेंट' करना होगा।'
मेरे तो पैरों तले से जमीन निकल गई। मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा - 'यार, उस संगठन के लोग कहाँ हैं जिन्होंने अनशन कराया है?' उसने कहा - 'वे तो सब अपने अपने घर चले गए हैं... तुम्हें कुछ नहीं करना बस एक आदमी का इंतिजाम कर लो... और सुनो...' वह जाने से पहले बोला - 'शाम को जूसवाले से जूस मँगा लेना, उसके यहाँ भी हिसाब चल रहा है।' पम्मी चला गया।
पम्मी ने अपनी टोपी मेरे सिर में फिट कर दी थी। मैं अब समझा कि यही है हमारा लोकतंत्र। अब मेरे साथ क्या हुआ यह मैं आपको नहीं बताऊँगा। बस यह समझ लीजिए कि अब मैं उस शहर नहीं जाता जहाँ अनशन पर बैठा था। क्योंकि टेंटवाला, चायवाला, जूसवाला, माली सब मुझे तलाश कर रहे हैं। पम्मी से मैंने जब यह बताया था कि यार टेंटवाला, चायवाला वगैरा मुझे खोज रहे हैं तो वह लापरवाही से बोला था - 'खोजने दो सालों को, इस देश में यही हो रहा है। किसी न किसी को कोई न कोई खोज रहा है और किसी को कोई नहीं मिलता। तुम आराम से अपने लिखने पढ़ने के काम में लग जाओ।'
मैं पम्मी की सलाह पर लिखने पढ़ने के काम में लग गया हूँ तब ही यह वाक्या लिख रहा हूँ।
माफ कीजिएगा मैंने बात शुरू की थी, एक शहर में एक आदमी और कुत्ते के पिल्लों के गायब होने से लेकिन होते हुआते मैं देश के लोकतंत्र पर आ गया। दरअसल वाक्यानिगारों की यही कमी होती है, वो बात शुरू तो कर देते हैं पर जानते नहीं कि बात कहाँ पहुँचेगी।
तो जनाब एक शहर में एक आदमी गायब हो गया। उसकी पत्नी पता चलाने पुलिस के पास गई तो पुलिस ने कहा कि अभी तक कोई सिरकटी लाश नहीं मिली है, जैसे ही मिलेगी उसे बता दिया जाएगा। आदमी की पत्नी यह सुन कर डर गई। पुलिस ने कहा - 'इस देश में मौत से डरोगी तो रह ही नहीं सकती। हम लोग मौत से नहीं डरते। आत्मा पर हमारा विश्वास है। मौतें तो इस देश में ऐसे आती हैं जैसे दूसरे देशों में बहार आती है। देखो दस पाँच हजार औरतें तो जला दी जाती हैं, दस बीस हजार सड़कों पर कुचल कर मर जाते हैं, पता नहीं कितने दंगों में मार दिए जाते हैं, अकाल और बाढ़ की तो पूछो ही मत। नौकरी पाने के इच्छुक गोली खा कर मर जाते है। आतंकवादी हजारों को मार डालते हैं। तो देश क्या है बूचड़खाना है। अब काजल की कोठरी में रह कर काला होने से क्या डरना... शुक्र कर, तेरे आदमी की अभी लाश नहीं मिली है। हो सकता है अपहरण हो गया हो। फिरौती के लिए चिट्ठी या फोन आए।'
औरत बोली - 'दरोगा जी, हमारे पास क्या है जो कोई फिरौती के लिए अगवा करेगा! दो टाइम खाने को नहीं जुटता।'
'तब तो अपहरण की ट्रेनिंग लेनेवालों ने अभ्यास के तौर पर तेरे पति का अपहरण कर लिया होगा।'
'ये क्या होता है दरोगा जी।'
'देख, देश में बहुत से प्राइवेट स्कूल कालिज खुल गए हैं। अपहरण उद्योग के रिटायर्ड लोगों ने मिल कर 'अपहरण कालिज' खोल दिया है। अच्छी फीस लेते हैं... वे अपने छात्रों से कहते हैं कि नमूने के तौर पर किसी का अपहरण करके दिखाओ... वे लोग तेरे पति को छोड़ देंगे... बशर्ते कि ...' पुलिसवाला बोलते बोलते रुक गया।
'क्या बशर्ते कि दरोगा जी?' औरत ने पूछा।
'देख, यह भी हो सकता है कि अपहरण के प्रयोग के बाद उन्होंने तेरे पति को किसी दूसरे स्कूल में पहुँचा दिया हो।'
'क्या मतलब दरोगा जी?'
'देख हत्या करना, गोली मारना, गला काटना आदि आदि सिखाने के भी तो स्कूल खुले हैं न?'
औरत रोने लगी। पुलिस बोली - 'रो मत, हो सकता है मानव अंगों की तस्करी करनेवाले किसी गिरोह ने पकड़ लिया हो। तेरा पति आ तो जाएगा पर ये समझ ले एक गुर्दा न होगा, या एक आँख न होगी, या मान ले ...' औरत रोने लगी। पुलिस ने कहा अब यहाँ थाने में न रो। यहाँ औरतें रोती हैं तो लोग जाने क्या क्या समझते हैं। यहाँ से तो तुझे हँसते हुए जाना चाहिए।'
ये तो हुई आदमी के गुम हो जाने की बात। अब सुनें कुत्ते के पिल्लों की गुमशुदगी की दास्तान। दरअसल जो कुत्ते के पिल्ले खोए है उन्हें कुत्ते का पिल्ला कहने से भी डर रहा हूँ। उसकी वजह है। आपको मालूम ही है कि कुछ साल पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जब अपने दल बल के साथ दिल्ली आए थे तो उनके साथ कुत्ते भी थे। उनके कुत्तों की प्रतिष्ठा, गरिमा, पद आदि के बारे में पता न होने के कारण एक भारतीय अधिकारी ने उन्हें कुत्ता कह दिया था। इसी बात पर उस अधिकारी के खिलाफ कुत्तों की मानहानि का दावा कर दिया गया था। अदालत में अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधि ने कहा था, ये कुत्ते नहीं हैं - इनके नाम और पद हैं। एक का नाम जैक जॉनी है और वह मेजर के पद पर है। दूसरे का नाम स्टीव शॉ है जो कैप्टेन है। तीसरी कुतिया का नाम लिंडा जॉन्स है जिसने अभी अभी ज्वाइन किया है और वह सेकेंड लेफ्टीनेंट है। अदालत ने इन अधिकारियों की मानहानि करने के सिलसिले में संबंधित अधिकारी को सजा सुनाई थी और यह आदेश दिया था कि भविष्य में इन कुत्तों को कुत्ता नहीं कहा जाएगा, यही वजह रही कि राजधानी के समाचारपत्र बड़े आदर और सम्मान से कुत्तों के नाम और पद छापते रहे। आप हम सब जानते हैं कि वैसे भी हमारे समाचारपत्र कुत्तों का कितना ध्यान रखते हैं क्योंकि उससे लाभ हानि जुड़ी होती है।
हुआ यह कि एक रात दो बजे मंत्रीपुत्र के घर से थाने फोन आया। थाने की नींद उड़ गई। मंत्रीपुत्र ने डाँटा और कहा कि तुम सोते रहते हो और चोर चोरी करते रहते हैं। तुम्हें पता है बेबी रतन और बेबी गौरी का अपहरण हो गया है। थाने में तुरंत कार्यवाही की बात उठी। पर सब जानते थे कि मंत्रीपुत्र अभी तक अविवाहित है और उसने कसम खाई हुई है कि जब तक स्वयं मंत्री नहीं बन जाएगा शादी नहीं करेगा। ऐसी हालत में बेबी रतन और बेबी गौरी कहाँ से आ गए। इस सवाल का जवाब कोई न दे सका तो हवालात में बंद एक अपराधी ने दिया। उसने बताया, बेबी रतन और बेबी गौरी मैडम लूसी और सर जॉनसन की औलादें हैं जिन्हें मंत्रीपुत्र यू.एस. से खरीद कर लाए थे और अनजान तथा अनाड़ी इन्हें कुत्ते के पिल्ले कह उठे थे जिस पर उसी समय उनकी जुबान खिंचवा ली गई थी।
रतन और गौरी के अपहरण की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। स्थानीय पत्रकारों के बाद टी.वी. चैनल वाले धमक पड़े और पूरा थाना कैमरों, लाइटों, कटरों से भर गया। कुछ टी.वी.वाले मंत्रीपुत्र की कोठी पर पहुँच गए। सबसे पहले यह 'ब्रेकिंग न्यूज' 'जल्वा चैनल' ने दी। उसके बाद यह ब्रेकिंग न्यूज 'समकुल चैनल' पर शुरू हुई। उसके बाद तो घमासान शुरू हो गया। हर चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज स्टोरी चलने लगी, रतन और गौरी के 'स्टिल्स' और 'फुटेज' की माँग इतनी बढ़ गई कि प्रोडक्शन हाउसोंवाले पागल हो गए।
चैनलों में तूफान मच गया। एक रिपोर्टर की नौकरी इसलिए चली गई कि वह रतन की फोटो नहीं ला सका। दूसरे चैनल में किसी का प्रोमोशन हो गया कि वह मंत्रीपुत्र की 'बाइट' ले आया। एक पत्रकार को पीटा गया, क्योंकि उसने मंत्रीपुत्र के कुत्ताघर, जिसे अंग्रेजी में सब 'केनल्ल' कहते थे, में घुसने की कोशिश की थी। दो पुलिसवाले सस्पेंड हो गए क्योंकि चार घंटे हो गए थे और उन्होंने रतन और गौरी का पता नहीं लगाया था। डी.एम. का ट्रांसफर होते होते बचा और एस.पी. को 'कारण बताओ' नोटिस दे दिया गया।
चैनलवालों ने पुलिस को पटाने का काम शुरू किया। वे चाहते थे कि इस पूरे ऑपरेशन में जिसे पुलिस ने 'आपरेशन ट्रुथ' का नाम दिया था, वे लगातार पुलिस के साथ रहें। 'जल्वा' चैनलवालों ने पुलिस को यह समझा कर पटाया कि 'आपरेशन ट्रुथ' के बाद चैनल पुलिस का इंटरव्यू दिखाएगा। यह बात 'चैनल फोर फाइव सिक्स'वाले को पता चल गई। उन्होंने पुलिस को पच्चीस हजार नकद देने का वायदा किया। कहा यह कि 'जल्वा'वालों की जगह उन्हें पूरे 'ऑपरेशन ट्रुथ' में साथ रखा जाए। यह बात 'मून चैनल'वालों को पता चली तो उन्होंने गृह मंत्रालय के एक सीनियर ऑफीसर से फोन कराया और आदेश दिया गया कि पुलिस 'मून चैनल'वालों को प्राथमिकता दे। बात इतने ऊपर पहुँच चुकी थी कि पुलिसवाले डरने लगे। डी.एम. को लगने लगा कि कल कहीं प्रधानमंत्री सचिवालय से फोन न आ जाए।
पुलिस ने छापे मारने शुरू किए। चार टीमें बनाई गईं और रात दिन रतन और गौरी की तलाश का काम शुरू हो गया। इसी दौरान मंत्रीपुत्र के पास फोन आया कि फलाँ फलाँ जगह पचास करोड़ रुपया न पहुँचाया गया तो रतन और गौरी की हत्या कर दी जाएगी। अब स्टोरी का एक नया 'ऐंगिल' निकल आया। चैनल विशेषज्ञों को बुला कर उनसे बहस कराने लगे। सुखद यह रहा कि चैनलवालों को इस मसले में विशेषज्ञ बदलने नहीं पड़े। दो चार आदमी जो राजनीति, समाज, वनस्पतिशास्त्र और खगोलशास्त्र के विशेषज्ञ थे और हर तरह के कार्यक्रमों में टी.वी. पर आया करते थे वही गौरी और रतनवाले मामले में भी आए और दर्शक यह सोच कर अचंभे में पड़ गए कि राजनीति के मर्मज्ञ कुत्तों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं। चैनलवाले गर्व से कहते थे कि विशेषज्ञता और 'प्रोफेशलनिज्म' के जमाने में हमने ऐसे लोग खोज रखे हैं जो संसार की किसी भी समस्या, ज्ञान विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में, लोक परलोक की किसी भी घटना के बारे में विद्वत्तापूर्ण ढंग से विचार व्यक्त कर सकते हैं।
ईश्वर का करना कुछ ऐसा हुआ कि पुलिस, सी.आई.डी., आई.बी., रॉ. और दूसरी खुफिया एजेन्सियों ने मिल कर रेड डालने शुरू किए और आखिरकार पता चला कि एक जगह शहर के बाहर एक फार्म हाउस में रतन और गौरी को रखा गया है। अपहरणकर्ता पूरे असलहे से लैस हैं। उनके पास बोफोर्स तोपों से ले कर 'एंटी-एयरक्राफ्ट गन' तक मौजूद है। अब तो सेना से मदद लेने की जरूरत पड़ी। गृह मंत्रालय ने सुरक्षा मंत्रालय से निवेदन किया और एक ले. जनरल के साथ ब्रिगेड भेज दी गई।
टी.वी. चैनलों पर बहस का मुद्दा यह था कि इस 'ऑपरेशन ट्रुथ' में रतन और गौरी सलामत निकल आएँगे या नहीं। यह भी जानकारी मिली कि अपहरणकर्ताओं ने मार्केट से दो सौ टन टी.एन.टी. भी खरीदी है और उसका जखीरा भी उनके पास है। टी.वी. चैनलों के वही विशेषज्ञ जो वनस्पति विज्ञान से ले कर सुपरसोनिक जेटों तक के विशेषज्ञ थे कहने लगे इतना 'एक्सप्लोसिव मैटीरियल' तो पूरे फार्म हाउस को ज्वालामुखी की तरह उड़ा देगा और जाहिर है उसमें नन्हे मुन्ने रतन और गौरी के बचने की क्या उम्मीद होगी। तब कहा गया कि यह दरअसल मनोवैज्ञानिक लड़ाई है। इसे भारत अकेले नहीं लड़ सकता। इसमें तो जब तक अमेरिका का सपोर्ट नहीं होगा यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। अमेरिका से कहा गया तो वहाँ से बड़ा सार्थक और उत्साहवर्धक जवाब आया। अमेरिका ने कहा कि वह तो संसार के हर कोने में शांति स्थापित करने के लिए दृढ़संकल्प है। जहाँ भी शांति भंग होने, मानव अधिकारों के हनन का सवाल उठता है अमेरिका उठ खड़ा होता है। और अब चूँकि भारत में ऐसी स्थिति आ गई है इसलिए अमेरिका अवश्य ही आएगा। यह भारत की सभ्यता है कि वह अमेरिका को आमंत्रित कर रहा है। यदि न भी कर रहा होता तो अमेरिका आता क्योंकि वह विश्व में शांति स्थापित करना चाहता है और यह उसके 'एजेंडे' का एक और पहला मुद्दा है। यही नहीं, अमेरिका ने घोषणा कर दी कि उसकी सेनाएँ ध्वनि से तेज चलनेवाले विमानों पर बैठ कर भारत के लिए रवाना हो चुकी हैं। हिंद महासागर में अमेरिकी बेड़ों को भारत की तरफ कूच करने का आदेश दे दिया गया है। और यह भी कहा गया कि भारत को चाहिए कि सेनाओं के पहुँचने से पहले कोकाकोला और पेप्सीकोला का पर्याप्त भंडार कर ले। मैक्डानाल्ड हैंबर्गर, अंकिल चिप्स, कनटकी चिकन, एफ.टी.जे. वगैरा की जितनी ज्यादा दुकानें खोली जा सकती हों खुलवा दे क्योंकि अमेरिकी सैनिक जाहिर है दाल रोटी नहीं खाएँगे। चूँकि यह आदेश था इसलिए इंतिजाम पूरा हो गया। बड़े बड़े अमेरिकी बाजार खुल गए जहाँ सुई से ले कर हवाई जहाज तक उपलब्ध था।
ऐसी तैयारी का नतीजा भी अच्छा निकला। लेजर बम से रतन और गौरी के एक अपहरणकर्ता को मार गिराया गया। दूसरा एक तहखाने में छिप गया था। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी, उसे पकड़ा गया। अमेरिकी सैनिकों ने कहा कि हम इसे अमेरिका ले जाएँगे और चिड़ियाघर में बंद कर देंगे ताकि विश्व शांति भंग करनेवालों के लिए एक सबक हो।
चूँकि अमेरिकी सैनिकों के लिए पेप्सी, कोला, बियर, हैंबरगर आदि का बड़ा स्टाक था इसलिए उन्हें वापस जाने की जल्दी नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम तो आपके देश से विश्वशांति भंग करनेवाली सभी शक्तियों को नष्ट करके ही जाएँगे। उनके इस विचार का स्वागत किया गया और वे यहाँ पेप्सी पी पी कर मोटे होने लगे।
जिस दिन थाने में रतन और गौरी पहुँचे उसी दिन वहाँ एक सिरकटी लाश भी पहुँची। रतन और गौरी के मिल जाने की वजह से थाने के चारों तरफ दफा 104 लगा दिया गया था, क्योंकि ओ.वी. वैनों से रास्ता बंद हो गया था और दर्शकों का सैलाब था जो अमेरिकी सैनिकों और रतन गौरी को देखने के लिए उमड़ पड़ा था। कई बार लाठी चार्ज हो चुका था पर दर्शक काबू में नहीं आ रहे थे। वे जयजयकार कर रहे थे। खुशी के मारे आपे से बाहर हुए जा रहे थे।
इसी बीच मैली कुचैली धोती बाँधे, तीन बच्चों को सँभाले किसी तरह गिरती पड़ती एक औरत थाने पहुँची। उसे पता लग गया था कि आज एक सिरकटी लाश थाने लाई गई है। किसी न किसी तरह यह औरत थाने के अंदर आ गई। वहाँ टीवी चैनलवाले भरे पड़े थे और अमेरिकी सैनिकों के साथ सिगरेटें पी रहे थे। एकआध बीयर की घूँट भी मिल जाती थी।
टी.बी.सी. चैनल की राधिका रमन ने देखा कि एक औरत सिरकटी लाश के पास खड़ी उसे पहचानने की कोशिश कर रही है। उसके साथ तीन छोटे छोटे बच्चे भी खड़े हैं। राधिका ने अपने बॉस सत्यकाम से कहा - 'सर, ये देखिए कितनी अच्छी स्टोरी है। सिरकटी लाश को यह औरत पहचानने की कोशिश कर रही है। तीन बच्चे पास खड़े हैं। इसे शूट करें सर?'
सत्यकाम बिगड़ कर बोला - 'क्या चाहती हो चैनल बंद हो जाए।'
'नहीं सर... लेकिन क्यों?' राधिका ने कहा।
सत्यकाम बोले - 'इस औरत, बच्चों और लाश का 'विजुअल' देख कर सी.ई.ओ. मिस्टर मेहरा मेरी तो छुट्टी कर देंगे।'
'क्यों सर?'
सत्यकाम बोले - 'ओ माई गॉड... तुम्हें ये भी बताना पड़ेगा? अरे हमारे चैनल पर 'ऐड' आते हैं, विज्ञापन समझीं?'
'हाँ सर।'
वो विज्ञापन किसके लिए होते हैं? कौन वह सामान खरीदता है? वह क्या देखना... 'चलो चलो कैमरा लगाओ... रिफ्लेक्टर... साउंड...' चैनल का संवाददाता चिल्लाने लगा क्योंकि थाने के अंदर बड़े खूबसूरत मंच पर रतन और गौरी को लाया जा रहा था। उनके पीछे पीछे मंत्रीपुत्र, कमल का फूल बना, आ रहा था। पीछे अधिकारी, सेना के पदाधिकारी आदि थे। संगीत बज रहा था। कबूतर और गुब्बारे हवा में छोड़े जा रहे थे। आतिशबाजी आसमान पर रंगबिरंगे करिश्मे दिखा रही थी। पूरी इमारत जगमगा रही थी। लगता था आज छब्बीस जनवरी या पंद्रह अगस्त है। चारों तरफ उल्लास, मस्ती, विजय का भव्य प्रदर्शन व्याप्त था।
उस औरत ने सिरकटी लाश पहचान ली थी। यह उसका पति ही था, औरत रो रही थी, पर मौज, मस्ती, आनंद, उल्लास, जश्न, गीत, संगीत के माहौल में उसकी आवाज कोई नहीं सुन रहा था।
उसके बच्चे अपने फटे पुराने कपड़ों में सहमे, सिकुड़े, मुँह खोले मंच पर होनेवाले तमाशे में डूबे हुए थे। वे न अपनी माँ को देख रहे थे, न बाप की सिरकटी लाश को।

Thursday, 13 July 2017

जामिया रंगमंच का बदलता स्वरूप और अदनान बिस्मिल्लाह

जामिया रंगमंच का बदलता स्वरूप और अदनान बिस्मिल्लाह 




                      -   अहमद फहीम


   
     बदलती दुनिया और संक्रमित हो रहे समाज की सोच-विचारधारा के साथ-साथ जामिया-रंगमंच रंगमंच की एक नई प्रयोगशाला को व्यवस्थित कर रहा है। कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी, अगर जामिया को रंगमंच का पर्याय कहा जाये क्योकि दो वर्षों में जिस तरह का हस्तक्षैप जामिया-रंगमंच ने रंगमंच की दुनिया में किया है, वे आश्चर्येजनक ही नहीं, एक कदम है व्यावसायिकता के इस युग में रंगमंच को पुनः परिभाषित करने का। एक कदम है- उस पंरपरा को पुन: जीवित करने का जिसे रंगमंच के पुरोधा अपनी-अपनी स्मृतियों में लेकर राख होते गए। एक कदम है- रंगमंच का लोगो के जीवन में अर्थ प्रदान करने और लोगो को भावी जीवन के लिए नुक्ताचीं बनाने में ।

                                               जामिया की इस नयी कवायद को अमली जामा पहनाने में जिस व्यक्तित्व का हस्ताक्षर है, वह है -रंगमंचीयी कोलाज पर उभरा हुआ युवा-रंग, रंगकर्मी अदनान बिस्मिल्लाह। जामिया के सांस्कृतिक इतिहास में इतिहास रचने वाला ऐसा व्यक्तित्व जिसने राष्ट्रीय स्तर और रंगमंच के कैनवास पर जामिया-रंगमंच के इन्द्रधनुष को उकेरा। यह वह व्यक्तित्व है जिसने जामिया को "कल्चरल-हब"  बनने में लोहार की तरह कड़क और कुम्हार की तरह रचनाशील होकर कार्य किया कि आज प्रत्येक विभाग रंगमंचयी प्रस्तुतियां देने में अग्रणियी साबित हो रहा है। आज जामिया के ड्रामा क्लब के इतर, विभाग की ओर से भी रंगमंच की प्रासंगिकता के अर्थ को सिद्ध करने, उसकी आवश्यकता को पाठ्यक्रम जितना ही महत्व दिलाने और विघाथियों में रंगमंच के प्रति समझ पैदा करने के लिए एक नई तरह की व्यवस्था को व्यवस्थित किया जा रहा है जो सिर्फ़ रंगकमी अदनान बिस्मिल्लाह के कार्यशील और प्रयोगशील रहने का ही नतीजा है जिस कारण आज उन्हें जामिय-रंगमंच के नए अध्येता के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।


     आज यह देखकर बड़ा ही ताज्जुब होता है कि जिस ड्रामा क्लब से उन्होनें अपने रंगमंच की शुरूआत की थी, आज वह उसी ड्रामा क्लब के निर्देशक पद पर असीन है। इस तरह उपलब्धि कुछ ही लोगो की किस्मत में बदी होती है कि जिस बरगद की छत्र-छाया में आप फले हो, आप भी उसी की तरह एक बरगद में तबदील हो जाए ।  लेकिन यह सब कहने की बात होती है क्योकि कोई यूँही बरगद नहीं हो जाता है। एक टहनी से बरगद हो जाने में उसे एक सदी-सी बीत जाती है और इसलिए अदनान बिस्मिल्लाह को भी रंगमंच के क्षेत्र में घुसपैठ करने तथा अपना मुकाम हासिल करने के लिए संघर्ष की हर धारा से गुज़रना पड़ा है।


   जामिया में पी.जी.डिप्लोमा इन जर्नलिज्म में दाखिला-प्रवेश के बाद उन्होंने जामिया ड्रामा क्लब में प्रवेश पाया लेकिन मात्र ६ महीने ही उन्हें वहाँ से विदा लेनी पड़ गयी मगर इस दौरान ही उन्होंने जामिया को नाॅर्थ-ज़ोन और नेशनल सांस्कृतिक यूथ काॅम्पीटीशन में रीपिरसेंट किया । ड्रामा-कल्ब छोड़ देने के बाद उन्होनें जामिया में ही अपना एक नया थिएटर ग्रुप शुरू किया और उसका नाम रखा - " प्रतिभा उन्नयन नाटिये मंच " और यही से उनके रंगमंच के संघर्ष की शुरूआत होती है।  उनकी यह शुरूआत भी दिलचस्प शुरूआत थी कि उन्हें जिस क्षेत्र में स्वंय को स्थापित और अपनी दावेदारी का लोहा मनवाना था। उसके विषय में ना तो किसी संस्थान से कुछ सीखा था और नहीं समझा और नाहीं कोई कागज़ का तुकड़ा लिया था जिसपर लिखा हो कि आप रंगमंच के बग़ीचे मे अपनी पौध लगा सकते है। उन्हें तो सड़क पर चलना था। सड़क से सीखना था और सड़क पर ही प्रयोग करना था यानि कि सड़क ही उनके के लिए रंगमंच का विश्वाविद्यालय बनी और सड़को पर चलने वाले लोग उनके महान शिक्षक बने जिनसे जो भी सीखा, उसे अपने रंगकर्म में उकेरते गए।


 एक दो साल बाद इन्होने दूरदर्शन में नौकरी के लिए आवेदन दिया और स्वीकृत हुआ जहाँ दूरदर्शन में रेह्कर कई मशहूर प्रोग्राम को प्रोडयूसड किया जिसमें " धरती नाचे एम्बर गाए " " दूरदर्शन के सुनहरे वर्ष " । कई नामचीन हस्तियों के साथ इंटरव्यू लिए जिसमे विष्णु प्रभाकर, श्याम बेनेगल, मन्ना डे, मशहूर डांसर सोनल मन सिंह आदि । '' Glimpes of dehli '' डोक्युमेंट्री में निर्देशक के तौर पर काम किया। तो " खानम "  सीरियल में अस्सिटेंट डिरेक्टर और एक अभिनेता के तौर पर भूमिका निभाई। मगर दूरदर्शन के साथ इनका सफर छ: वर्ष का ही रहा और किन्हीं कारणो से इस्तीफा देने के बाद पूरी तरह से थिएटर के लिए ही समर्पित हो गए और फिर जामिया में अपने थिएटर ग्रुप के साथ-साथ शहीद भगत सिंह, काॅलेज , पी.जी.डी.ए.वी. काॅलेज, बिला बोंग इंटरनेशनल हाई स्कूल नॉएडा, मानवभारती इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल आदि में थिएटर कोच रहे। जामिया के फाइन आर्ट्स विभाग में स्टेज-क्राफ्ट के इंस्ट्रक्टर और इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया मैनेजमेंट एंड कम्युनिकेशन स्किल्स में थियेटर- कोच के रूप में कार्य किया और आज जामिया ड्रामा क्लब के को-कविहनेर और हॉबी क्लब के इंचार्ज है और जामिया-रंगमंच की ओर से होने वाली सभी प्रस्तुतियों का कार्यभार संभालते है ।



     बारह से तेहरा वर्षो के अपने रंगकर्म में इन्होंने १०० के करीब नुक्कड़ों की प्रस्तुतियां दी । जिसमें गिरगिट, औरत , अपहरण बेचारे का, पुलिस चरित्रम, कुर्सी , बात का बतंगड़, सोच एक सवाल, संघर्ष हमारा नारा है, सड़क पर घर, मेह्गाई की मार, आर्तनाद, सोच आदि । कई मंच प्रस्तुतियां जिसमे - कफ़न, हवालात, कंजूस, दुलारी बाई, सबसे बड़ा आदमी, जवानी की डिब्बी, दो पैसे की जन्नत, बाँझ, कमीशन, हिजड़ो की पार्लिमेंट, बम बोले , डिसिपीलिने, यह भी हिंसा है, मेरा क्या कसूर था, जिस लाहौर नै देख्या वो जामियां नै, ग़ालिब कौन है, रिहल्सल, गाँधी ने कहा था, खालिद की खाला, अंधेर नगरी, हम ही करेंगे, बद्ज़ात तितली ( नाट्य रूपांतरण " शकीला की माँ " अमृतलाल नागर आदि जैसे यथार्थिक और मार्मिक नाटकों को निर्देशित किया ।


    रंगकर्म की उपरोक्त प्रस्तुतियों के मंचीयकरण में अदनान बिस्मिल्लाह जहाँ एक ओर सफ़दर हाश्मी की नुक्कड़-परम्परा के प्रतिबिंब नज़र आते है जिसे उन्होंने लगातार सड़को, चौक, चौहराहो, झुग्गी-बस्तियों में जा-जाकर पुनः जीवित करने की कोशिश की है तो दूसरी ओर हबीब तनवीर की प्रयोग-रीति और आशु-अभिनय को अपनाते हुए नाटकों के मंचन से नयी मिस्साल कायम की है। महान रंगकर्मी हबीब तनवीर के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी नाटिये प्रस्तुतियों में जिस शैली का इस्तेमाल करते थे कि एक, वह जिन कलाकारों का चुनाव करते थे, वह लोग मूल रूप से लोक-परम्पराओ से जुड़े होते थे। दूसरा, मंचन से पूर्व जिस आशु-अभिनय का वह अभ्यास करते थे, वे उन्हें असीम अनुभवों से भर देते थे और उनका नाटिये मंचन दर्शको के सामने एक नया उदाहरण बनकर पेश होती था।


    मूलतः अदनान बिस्मिल्लाह भी उसी तकनीकी को आगे बड़ा रहे है। उसे ही व्यापक रूप देने की कोशिश कर रहे है लेकिन एक अदद बात अदनान बिस्मिल्लाह के रंगकर्म के बारे में अनोखी है कि उनका अबतक का रंगकर्म विद्यार्थियों के साथ रचा गया रंगकर्म है और यही उनके रंगकर्म की एक मूल विशेषता भी रही है कि उन्होनें विद्यार्थियों को रंगमंच के प्रति संवदेनशील और उसे समझने की कला को निखारने और साथ ही साथ उनमें प्रयोगशाली रहने की जिज्ञासा को ज़िदा करने की सूक्ष्म दृष्टि को विकसित करने का कार्य किया। विद्यार्थियों के साथ ही उन्होंने नए-नए प्रयोग किये । इन प्रयोगो में जहाँ एक ओर वह ब्रेखत के प्रयोगो को अपने नुक्कड़ रंगकर्म से जोड़ते रहे है तो दूसरी ओर स्तोलोनोवोस्की के प्रयोगो को अपने मंच-रंगमंच से कफ़न, हवालात, गाँधी ने कहा था, जिस लाहौर नई दैख्या वो जमिया नई और बदज़ात तितली जैसी सफल और अतिप्रशंसित नाटको का मंचन करके गूढ़-रिश्ता कायम किया है।


   
   यह इन्ही प्रयोगो का प्रतिफल है कि जामिया ने नार्थ-ज़ोन और नेशनल यूथ फेस्टिवल में अपनी धाक जमाई है और यह धाक ही जामिया को राष्ट्रीय स्तर पर हस्ताक्षर कराने में मददगार रही। आज जामिया जिन " प्रतिभाओ के अजायबघर " से शुमार और चर्चित और नए प्रतिमान को गढ़ने में रंगमंच के रथ का सारथी बना हुआ है, रंगमंच को हरेक विद्यार्थी के लिए ज़रूरी और लाभदायक बनाने में पहल कर रहा है, वह अदनान बिस्मिल्लाह के रंगमंच की नाव के गतिशील रहने से ही निर्मित हो रही है और आशा करते है कि इस नाव का खवैया कभी इसको धूमिल और पत्थर नहीं होने देगा।




Friday, 30 June 2017

ट्यूबलाइट : राष्ट्रीयता और राजनीति का अक्स


       ट्यूबलाइट राजनीती और देशभक्ति का पर्याय                                                                                               


                                                                                                                           -- अहमद फहीम



" तुमने अपना काम पूरा कर दिया है।
    अगर कंधे दुख रहे हो,
    कोई बात नहीं ।
    यकीन करो कंधों पर,
    यकीन करो कंधों के दुखने पर
    यकीन करो, यकीन करने पर
    यकीन न करने पर, यकीन करो । "
                                      -- कवि केदारनाथ सिंह
                                               ( हिन्दी )

       कभी-कभी यकींन करना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि  लौटने वाले लौट आएंगे, कि लौटना इस दुनिया में प्रत्येक वस्तु की स्वभाविक प्रवृत्ति है और यकीन रखना हमारी जन्मजात प्रवृत्ति । इस बात पर यकीन रखना कि हम ज़िंदा है ' क ' के लिए। ' क ' ज़िंदा है ' त ' के लिए और  ' त ' ज़िंदा है ' स ' के लिए । ऐसे ही एक लम्बी चैन , एक लम्बी धारा, और अनंत तक जाने वाली कड़ियों से हम सब जुड़े है। इस यकीन के साथ कि एक दिन सब अच्छा हो जाऐगा । एक दिन सब के पास प्रेम होगा । सब और शांति होगी कि दुनिया की सभी जंगे एक दिन ख़त्म हो जाऐगी और लौट जाऐगें सभी सैनिक अपने-अपने घरो को । सीमाऐं, लोहे के तारो की जगह घासों में बदल दी जाऐगी। यकीन यह कि एक दिन किसी को अपनी देशभक्ति प्रमाणित करने के लिए इस यकीन के साथ नहीं जीना पड़ेगा कि मेरे खून का रंग इस देश की मिटटी से अलग है। ' यकीन ' की इसी विचारधारा का आईना है  फिल्म " ट्यूबलाइट " । कबीर खान द्वारा सलमान खान को लेकर बनाई गयी, अबतक की सबसे असरदार और यथार्थवर्दक फिल्म है। यह फिल्म भले ही सलमान के दर्शकों को खुश न कर पाई हो, एक हफ्ता में सौ करोड़ का आकड़ा न छू पाई हो किन्तु फिल्म ने अपना किरदार वर्तमान परिस्थियों के संदर्भ में बखूबी निभाया है।


इस फिल्म की दो खास विशेषताएं है। पहला, यह कोई प्रेम फॉर्मूला नहीं था जिसने सलमान के दर्शको को सिनेमा हॉल में निराशा के पोपकाॅन खाने के लिए मजबूर किया। दूसरा, फिल्म में जिन मुद्दों को उठाया गया है , वे भले ही हमारे दिलो दिमाग में हास्यप्रद प्रतीत होते हो लेकिन, है बड़े ही प्रासंगिक। क्योकि जिन मुद्दों को परदे पर उकेरा गया है वह बहुत ही संवेदनशील है और आप जानते होंगे कि इस देश में संवेदनशील कौन है - कांग्रेस , देशभक्ति और सेना और अल्पसंख्यक ।
 
       फिल्म में हमे उस व्यक्ति के आदर्शो से साक्षत्कार करने को मिलते है जिसने यकीन की ही ताकत के बल पर देश के युवको में क्रांति की आग को फैलाया था। फिल्म के दोनों मुख्य किरदार देश-पिता महात्मा गाँधी के आदर्शोंं के रूप में है। 'अ ' ट्यूबलाइट का पर्याय । ' स ' लैम्पपोस्ट का । 'अ' यकीन की ताकत से अपने भाई को लाने की, युद्ध के सम्पात होने की इतनी आशा, इतनी उम्मीद जगा लेता है कि सब उसे अवतार समझने लगते है। ' स ' लेम्पपोस्ट, गाँधी जी के देशभक्ति वाले एक दूसरे आदर्श का अक्स होता है जो युद्ध के समय देश की रक्षा हेतु सेना मैं भर्ती हो जाता है और देश सेवा के लिए तैयार हो जाता है।



फिल्म ऐसे ही कई पक्षों से संवाद कायम करने की कोशिश करती है। फिल्म हमे एहसास करती है कि कांग्रेस के पूज्ये नेता जवाहर लाल नेहरू एक स्तर पर आकर असक्षम साबित हो जाते है और असक्षम साबित हो जाती है उनकी सैन्य-उपकरण की विधियां। उनकी गुटनिरपेक्षता की जादुई चिड़िया असक्षम साबित होती है कि देश को उनकी वजह से अपने शरीर से अंगदान करना पड़ा था और आज की वर्तमान सरकार की सैन्य उपकरण तकनीकी अत्यधिक प्रभावशाली है। वह आतंकवादियों से लड़ती है सर्जिकल स्ट्राइक करती है और एहसास करती है कि हम सर्वोच्च है और हमारे सिवा कोई विकल्प नहीं। शायद इसलिए गत दो वर्षो से लगातार कांग्रेस की पृष्ट्भूमि पर आधारित सिनेमा की होड़ लगी है । कभी एमरजैंसी तो कभी भारत-पाकिस्तान तो कभी चीन-वॉर को लेकर सिनेमा बनाने का कांग्रेसी सूत्र इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें दो बातें हो सकती है।  एक, या तो निर्देशक वर्तमान सरकार को खुश करने के लिए ज़ोर दे रहे है या फिर सरकार के बखान करने का कोई नया तरीका हो सकता है। सन 75 , इन्दु सरकार, बादशाहो, गाज़ी अटैक और ट्यूबलाइट आदि ऐसे ही फिल्मो के कुछ उदाहरण है जो सिर्फ राजनीती का पर्याय ही स्पष्ट करते है।


फिल्म हमारी उन स्मृतियों के दरवाज़ों पर दस्तक देती है जिसे हम सुना नहीं चाहते है कि, सीमा पर रहना वाला जवान, सिर्फ एक जवान नहीं होता है, हाड़-मांस का टुकड़ा नहीं होता है । भावनाएँ ,एहसास उनमे भी होते है। उनमे भी चाह होती है कि वे केवल गिनती के दिन अपने घरो पर न बिताये । उनमेंं भी चाहत होती है कि वे भी किसी माँ का बेटा, किसी भाई का भाई, पत्नी का पति, किसी का पिता बने। अपने बच्चो को बड़ा होते देखे लेकिन देश के उन्मांद, कुछ लोगो के पागलपन के  कारण सारी यातनाऐं उन्हें ही झेलनी पड़ती है ताकि देश देश रहे , सीमा सीमा रहे। फिल्म सोचने पर मजबूर करती है कि जब पूरा देश तल्लीनता की नींद में सोता है तो हज़ारो मील ऊपर पहाड़ो पर, सर्द बर्फीली रातो में तिरंगे को उठाए सैनिक आसमान को निहारते हुए, क्या सोचते होगें ?  कि क्या हम सिर्फ इसी के लिए बने है ? जंग की गूंज सफ़ेद पत्थरो के अंदर से उठती है और निर्वासन हम झेलते है ? फिल्म सैनिको के अंदर छुपी उनकी व्यथा का पाट करती नज़र आती है।
   
      आज अल्पसंख्य समुदाय जिस तरह की प्रताड़ना का अधिकारी है और कुछ हाल में बीती घटनाओं ने, उसे और भी  प्रताड़ना का राजा बना दिया है और इतना संवेदनशील बना दिया है कि अब कोई छू भी दे, तो मामला सीधा हत्या का बनता है। फिल्म में ऐसे ही दो अल्पसंख्य किरदार होते है - ' ऊ ' और  ' इ ' । इनके दादा-परदादा कभी चीनवासी रहे थे किन्तु अब भारत ही इनकी जन्मस्थली होती है। चीनी भाषा वंशी होते हुए भी हिंदी उतनी ही अच्छी तरह बोलते है जितनी कि एक भारतीय बोल सकता है । मगर युद्ध छिढ़ते ही लोग उनके पीछे पड़ जाते है और वे कोलकाता से कुमाऊं में रहने लगते है जहाँ ' अ ' ट्यूबलाइट रहता है लेकिन वहाँ भी  हिंसा और देशभक्ति उनका पीछा नहीं छोड़ती है । उधर चीन की आंधी भारत की हवा पर भरी पड़ती है इधर लोगो का गुस्सा उन पर उतरने लगता है और मजबूरन उन्हें बीच चौराहे पर चीख-चीख कर कहना पड़ता है कि " हम भी भारतीय हूँ । हम भी भारत-माता की जय बोल सकते हैं । "


अब ज़रा आप सोचिए कि परिस्थितियाँ कुछ यूँ होती - युद्ध चीन की जगह पाकिस्तान से होता और वो परिवार मुस्लिम होता। तो आप कल्पना कर सकते है कि फिल्म में इस क्रिया पर पूरे देश की क्या प्रतिक्रिया होती ?
    इस मुददे को लेकर फिल्म अपना सार देती है कि यदि  आप किसी देश में अल्पसंख्यक है और आपके बहुसंख्यक वाले देश या आपके प्रिय देश से उसका युद्ध हो जाए और परिस्थितियाँ चीन- भारत युद्ध की तरह ही रहे तो आपको अपनी देशभक्ति को प्रमाणित करना ही होता है अब इसमें चाहे मुस्लिम हो, ईसाई हो, चीनी हो, सिख, जैन, बौद्ध आदि कोई भी हो, उसे प्रमाणित करना ही होगा कि मेरे खून का रंग भी देश की मिट्टी से मेल खाता है । मैं भी उतना ही भारतीय हूं जितना कि तुम। इसका दूसरा पक्ष यह कि फिल्म उन लोगो की ज़हनियत पर तैज़ाब छिड़कती है जो यह सोचते है, देशभक्ति, राष्ट्रनिर्माण और देश बचाओ का सारा ठेका देश के बहुसंख्यकों के ही ज़िम्मे है और जो सोचते है कि " भारत माता की जय " बोलने से यह प्रमाणित हो जाऐगा कि मैं, अमुख से सच्चा और बेहतर देशभक्त-जीव हूं । फिल्म ' ट्यूबलाइट ' इसी तरह के तर्क-वितर्क को लेकर एक ज़िंदा मिसाल है।

Sunday, 25 June 2017

लाइफ इन ए मेट्रो : संवदेनऔ का कोलाज




अगर आप भी उदास और अकेले है तो देखिये " लाइफ इन ए मेट्रो "

     
       
 


                          ---  अहमद फहीम 

         
      हम उदास क्यों होते है ? सिर्फ इसलिए कि हम जीवन के किसी अँधेरे टापू पर आ चुके होते है ? या फिर ऐसे समुन्दर पर सवारी करने लगते है जहाँ सीमाओं का छोर अनंत होता है ? हम लहरो के भंवर में  पहाड़ बनते चले जाते है ? या हम वक़्त की किताब के कोरे पन्ने बनते चले जाते है जहाँ हमारा वजूद हमारा नहीं होता है। हम जो सोचते है वो स्वीकार तो करते है कि  हम सोच रहे है लेकिन क्या ऐसे होता है ? ऐसा क्यों नहीं होता है ? यही सवाल  इक्कीसवीं सदीं के  मेट्रो शहरों में  रहने वाले प्रत्येक आयु के  लोगो का है

         सपने इच्छाएं और लालसा और उनसे उपजी मानवीय-जीवन के  नए चलचित्रों की गाथा कहती हुई अनुराग बासु की फिल्म " लाइफ इन ए मेट्रो " महानगरों में  कच्ची पपड़ी की तरह सिमटी हुई ज़िंदगानियो का दस्तावेज़ी दर्शन प्रस्तुत करती है । फिल्म बताती है कि  महानगरों में  सपने , सपने नहीं होते है बल्कि एक सोचा समझा अग्रीमेंट होते है इसलिए कि इनके खोखले सपनों की बुनियाद मज़बूत तो बहुत होती हैं लेकिन उसको पूरा करने के  रस्ते केवल भीड़ बन जाना होता है । फिल्म बताती है कि  यहाँ रहने वाले हर आदमी को उदासी सामना , हर दो कदम करना पड़ता है और सारी उलझनों की जड़ यही है , इसी के  कारण यहाँ के लोगो का जीवन एक हंस की मांनिद हो जाता है । वैसे उदासी कोई बुरी बलां नहीं है अगर इसको बड़ी शिद्दत से महसूस किया जाये तो ये उदासी , उदासी नहीं रहती है जीवन का नया दर्शन बनकर उभरती है । नए सपने पुराने सपनो को अपना हम साया मन लेते है । एक नया सवेरा पुराने सवेरा को ऊष्मा देता है । प्प्लिइसलिए कि हम अपनी उदासी , अपनी वेदना, पीड़ा और अपने काले सायों को महसूस करना शुरू कर देते है।  फिल्म इससे भी कहीं ज़यादा कई अर्थो को ज़बान देने की कोशिश करती है।
         फिल्म की मूल संवेदना है कि  जब कोई हमसे हमारा अपना छूट  जाता है, कोई हमे अछा नहीं लगता है, यह मेरे लिए फिट नहीं है , यह मेरे लेवल का नहीं , इसके साथ  मैं खुश नहीं हूँ माँ, मैं  उसके साथ खुश हूँ क्योकि मुझे अपनी ज़िन्दगी कोई कोरे कागज़ की इबारत नहीं चाहिए , क्योकि मुझे जीवन जीने का सलीका कोई पुरानपंथी नहीं , नई दुनिया का नया फ्लेवर चाहिए। मैं एक स्त्री हूँ , मुझे अपना जीवन जीने की स्वतंत्रता का अधिकार चाहिए । क्योकि यह इन महानगरों की प्रवृत्ति है कि  सबको अपने हिसाब से जीना एक ढोंग होता है ।उस आईने को कोई नहीं तोड़ना चाहता हैं जिसमे वो अपना सफ़ेद सच देखते है, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।" लाइफ इन ए  मेट्रो " इन्ही नन्हीं-नन्हीं संवदेनाओं का पुलिंदा है ।
         इस फिल्म के ज़रिये अनुराग बासु ने महानगरों की उस प्रवृत्ति को दिखाने की कोशिस की है जिसे हम या हमारा सभ्य समाज एक गल्प ही मानता है । वह है- प्रेम और सेक्स । पहले प्रेम किया जाये या सेक्स ? अगर सेक्स हो जाए तो क्या प्रेम हो सकता है ? और फिर प्रेम होने के क्या पैमाने है ? इस कायनात के यह दो सबसे हंसी मौंजूं है जिसे हमारा समाज सिर्फ महसूस करता है , स्वीकार नही करता । ये फिल्म ऐसे ही आठ लोगो की प्रेम से सेक्स और सेक्स से प्रेम तक की प्रक्रिया में उलझीं, उनकी दैनदिन की ज़िन्दगी को बड़ी ही सत्यता के  साथ प्रस्तुत करती है।

         फिल्म हर किरदार का एक समान मकसद होता है, वह है - सफलता पाना । सफलता कैसी ? इसका कोई पैमान नहीं । सफलता उसके कैरियर की , कैरियर में मदद करने वाले साधन यानी अपने से उच्च अधिकारियो के साथ सहवास में फलता , प्रेम में सफल होने की, वैवाहिक जीवन से काले साओं को हटाने की सफलता। इन सफलताओं के  पीछे की सारी कुंठाये हर किरदार की ज़िन्दगी में  है , भले ही उनकी परिस्थितया अलग क्यों न हो लेकिन मूल सबका यही है कि  अच्छी नौकरी, खूब पैसा, खूबसूरत सा प्रेम और अपनी कुंठाऔं से मुकत होने के लिए सुकून सा संम्भोग ।
       आठ किरदारों के बीच उफनती हुई छ गाथाएं आज के महानगरों की पेचीदा ज़िन्दगी को दिखने में पूरी तरह सक्षम है। सभी कहानियां आपस में समानांतर चलती है । हर किरदार एक दूसरे से कहीं न कहीं जुड़ा हुआ है ।एक किरदार की ज़रूरत कोई तीसरा पूरी करता है और दूसरा तीसरे की कुंठाऔं को अपने ऊपर ढोता है। चौथा पहले की वजह से संतुष्ट नहीं और वो अपनी ख़ुशी किसी छटे में तलाशता है तो पांचवा समझ ही नहीं पता कि  असल ख़ुशी क्या है ? घर से दूर रहकर नौकरी, पैसा, या फिर सही प्रेम की तलाश क्योकि उसे शादी जैसा सुनहरा सफर शुरू करना होता है किन्तु नहीं, उसे जब भी मिलती है तो बस, तलाश जारी रखने के कुछ और प्रयास । दो किरदार और है। विवाहित ।एक बच्चा। लड़की के  पास वो सब कुछ होता है जो वो शादी से पहले सोचती थी । अपना घर । आज़ादी।  पैसा और माँ बनने का सुख । लड़के के  भी सभी अरमान पूरे होते है। टाइम पर खाना , बच्चे की देख भाल और रोज़ रात को सेक्स किन्तु दोनों में  अगर कुछ नहीं होता है तो वह है - विश्वास । जब वो विश्वास को खोजते है तो विश्वास अपनी कुंठाओं से मुक्त होने के लिए कहीं ओर आत्मसमर्पित हो जाता है, क्योकि कोई रिश्ता तब तक ही रिश्ता रहता हैं, जब तक की उनकी तन्हाई उनका साथ न छोड़ दे और जब तन्हाई ही आपस में  लड़ना शुरू कर दे तो, '' तो " का अर्थ होता है - किसी नए की तलाश ।
      इस तरह फिल्म इन किरदारों की मनोवैज्ञानिक-मनोदशा से वो कोलाज दर्शकों के सामने रखता है जहाँ वे महसूस करने लगते है कि  इस पूरी कायनात में कोई अकेला नहीं होता। हर आदमी किसी की ज़रूरत होता है। उम्र भले ही कौन-सी हो, अगर आप अकेले होते है तो अपनी ही तन्हाई से, इसलिए कि आप मानने लगते है कि  अब मेरा जीवन व्यर्थ है। अब मैं ख़त्म हो चुका हूँ या हो चुकी हूँ । दुखी रहना ही हमारी प्रवृत्ति हो जाती है लेकिन यह तब तक ही रहता जब तक कि आपको कोई ऐसा शख्स नहीं मिल जाता जो आपको आपसे मिलवायें ।आपके डर को छूमंतर कर दे । ऐसा ही एक किरदार और होता है जो बताता है  कि  मेरी जान तुम्हारे अंदर जितनी भी कुंठाये है, जितने भी वलवले है। सबको बारी -बारी से महसूस करो और इतना करो कि  यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाये और फिर अपने दिल से कहना - " मेरी जान एक मौका और देके देख , एक चांस देकर देख, मैं सच कहता हूँ कि कुछ हो न हो लेकिन इतना ज़रूर होगा कि  जीवन के गलियारों में नई आवाज़े तुम्हे पुकारेगी । फ़िज़ा का रंग बदलेगा, क्योंकि इस दनदनातें शहरों में जीने का सिर्फ एक यही तरीका है और कुछ नहीं "
       यह फिल्म कुछ न सही तो एक आस जगाती है । फिर से जी उठने की, जीवन के इन्द्रधनुष में रंग भरने कि यह एहसास कराने कि हम जिन्दा हैं।

Saturday, 17 June 2017

शिक्षा मेरे लिए अवसाद का एक प्याला

शिक्षा मेरे लिए अवसाद का एक प्याला

                                 -" फहीम "





 
" सौ सुनार की एक लौहार की " कहावत बचपन में सुनी थी जिसे न समझा था और नहीं वो समझ में आई थी लेकिन पता नहीं कैसे जौक की तरह मुझसे आ लिपटी | एक गलती  हुई और सौ सुनार की हो गई | एक गलती ने मेरी आधी से अभी अधिक गलतियों को जन्मा | एक गलती ने आज मेरे भविष्य को किसी अँधेरे टापू पर अवसाद के  समुन्द्र पर छोड़ दिया हैं , जहाँ पहले-पहल अवसाद के इस टापू पर आना एक भावनात्मक क्रिया थी , वहीँ इसमें अब गोते लगाना एक राजनितिक षड्यंत्र का नतीजा हो गई |  मेरी इस एक गलती का नाम है -  शिक्षा | 




जी  हाँ, शिक्षा - सफ़ेद कुर्सी प्राप्त  करने की सांस्कृतिक कला और आम आदमी के  लिए आलादीन का चिराग | घिसा नहीं कि आपकी झोपड़-पट्टी से महल बनकर तैयार | लेकिन मुझे जिस चिराग को घिसने क लिए दिया गया वो किस ज़माने का था मुझे मालूम ही नहीं | सत्ता के पेशेवर कारीगरों ने किस तरकीब से उसका अविष्कार किया था कि कीमत भी अदा हो जाये और बाजार का माल  बाजार में ही रहे | खैर , बात जो भी रही हो मेरी इस गलती की कार्यवाही उस वर्ष हुई जब मेरा सिन सोलह का था और मैने हाई स्कूल की परीक्षा दूसरी बार में  दिवतीय  श्रेणी  में  पास की थी | फिर भी  सब खुश थे | मेरे मोहल्ले के  कायदे अनुसार अब्बू मेरी पढ़ाई  जारी रखने के  पक्ष  में  नहीं थे और भैया कहते थे कि में पढूं | चाहता में  भी था कि  पढूं |  अब मैं करता भी क्या , घुंगरू का  कार्य  होता है  - बजना और मैं  बजता रहा  |  
बारहवीं के बाद मेरा जो खुद का यूटोपिया बना था , बड़ा ही कमाल  का था | बाहर  शहर में  जाकर पढ़ना और पढ़ लिखकर एक अच्छी सी नौकरी और एक खूबसरत सी लड़की और खूब पैसा और एक अच्छा सा घर | मगर जब बाहर आया तो सपना छोड़ो , खुद को बचाना कोहे तूर के  सामने खड़े होने क बराबर हो गया | फिर धीरे -धीरे मेरी सुविधा अनुसार शहर की दमक मुझे खाने  लगी और अब तक खा रही है , मगर मैं अब भी उलझन में  हूँ कि  सही क्या था ? भैया या अब्बू ? या फिर मेरे वो सरे दोस्त जो आज नौकरी-दा हो गए है और मैं आज भी एक निरहा बुद्धू !




लेकिन आज मैं अब्बा का सबक बड़ी ही शिद्दत क साथ दोहराने लगा हूँ | वो काम अच्छा था | न भैया फॉर्म लाते , न मैं फॉर्म भरता | अब्बू की बात मान काम सीखता रहता और दो-तीन साल में  ही अच्छा कारीगर बन जाता | पैसे आने लगते | फिर मैं चला जाता सऊदी | तीन-चार साल रहकर एक  मुश्त रकम इकट्ठा कर लाता | अब्बू को देता और वह दादी का इलाज करते और वह ठीक हालत में  कुछ और दिन ज़िंदा रहती | घर बनता और फिर जिसे चाहा था उसी से शादी भी हो जाती | और देश से एक और बेरोज़गार कम हो जाता | आज मैं अपने घर होता और अब्बा-अम्मा की सेवा करता  |  






आज मैं जो इस समाज के  पीछे पड़ा रहता हूँ , मैं भी इसी समाज में  होता |  चुप्पी साधे लोगो की तरह सुन रहा होता | दुनिया की टेंशन  न होती  | साहित्ये , इतिहास, रंगमंच चाँद पर जाने  जैसी बाते होती | मैं फिर धर्म  को यूँ न कहता | लोगो से यह न कहता कि  नहीं..नहीं.. हम सब क पीछे एक साया हमेशा छुरा  लिए रहता है | हमारी इस दुनिया में एक दुनिया और साथ रहती है | हम सबकी बेकारी  और जीवन से झूझने का कारण हमारे बाप -दादाओ का गरीब होना या असफल होना नहीं , एक राजनितिक रहस्य है यानि कि इस देश में जो गरीब है , असफल है , वो इसलिए असफल और गरीब नहीं कि  उनके पुरखे ऐसे थे बल्कि देश की सरकारे  चाहती है कि हम सब ऐसे ही रहे | .... .....  ...... ...... सच मैं यह सब बिलकुल भी नहीं कहता , अगर ये एक गलती न हुई होती |
  
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" भवन्ति " - संम्पादक के जीने की ज़रूरत।

                " भवन्ति '' - संम्पादक के जीने की ज़रूरत। मैंने " भवन्ति " के बारे में सुना और जाना कि ...